दुबई में भारतीय सैलरी का सपना कितना सही? महिला ने बताया असली खर्च, कहा- सिर्फ रुपये में बदलकर न देखें कमाई
दुबई का नाम आते ही लोगों के मन में ऊंची-ऊंची इमारतें, लग्जरी कारें, चमचमाती सड़कें और शानदार लाइफस्टाइल की तस्वीर सामने आती है। सोशल मीडिया पर दुबई की खूबसूरत तस्वीरें और वीडियो देखकर भारत के हजारों युवाओं को लगता है कि अगर वहां नौकरी मिल जाए तो उनकी जिंदगी पूरी तरह बदल सकती है। खासकर जब दुबई में मिलने वाली सैलरी को भारतीय रुपये में बदला जाता है तो रकम काफी बड़ी नजर आती है। लेकिन क्या सिर्फ करेंसी कन्वर्जन देखकर यह तय किया जा सकता है कि दुबई की नौकरी भारत की तुलना में ज्यादा फायदेमंद है?
दुबई में रहने वाली एक भारतीय महिला ने इसी सोच को लेकर लोगों को रियलिटी चेक दिया है। उनका कहना है कि किसी भी देश में मिलने वाली सैलरी को सिर्फ भारतीय रुपये में बदलकर देखना पूरी तस्वीर नहीं बताता। कमाई के साथ यह समझना भी जरूरी है कि उस देश में रहने के लिए कितना खर्च करना पड़ता है और महीने के अंत में वास्तव में कितनी रकम बचती है।
दुबई में नौकरी करने वाले लोगों के लिए सबसे बड़े खर्चों में घर का किराया, खाने-पीने का खर्च, परिवहन, मोबाइल और इंटरनेट जैसे रोजमर्रा के खर्च शामिल हो सकते हैं। अगर कोई व्यक्ति अकेले रह रहा है तो आवास का खर्च उसकी आय का बड़ा हिस्सा हो सकता है। वहीं परिवार के साथ रहने पर घर, बच्चों की पढ़ाई, स्वास्थ्य और अन्य जरूरतों का खर्च और बढ़ सकता है।
यही वजह है कि किसी भारतीय को अगर दुबई में ऐसी सैलरी मिलती है जो भारतीय रुपये में बदलने पर कई गुना बड़ी दिखाई देती है, तो इसका मतलब यह नहीं कि वह व्यक्ति भारत के मुकाबले उतनी ही गुना बेहतर जिंदगी जी रहा है। असली तुलना करने के लिए दोनों जगह की आय, खर्च, बचत और जीवनशैली को एक साथ देखना जरूरी है।
महिला के मुताबिक, दुबई में नौकरी का फायदा केवल सैलरी से नहीं बल्कि कंपनी की ओर से मिलने वाली सुविधाओं पर भी निर्भर करता है। अगर किसी कर्मचारी को रहने की जगह, ट्रांसपोर्ट, मेडिकल इंश्योरेंस या अन्य सुविधाएं मिलती हैं तो उसकी वास्तविक बचत बेहतर हो सकती है। इसके विपरीत अगर ये सभी खर्च कर्मचारी को खुद उठाने पड़ें तो बड़ी दिखाई देने वाली सैलरी का एक बड़ा हिस्सा खर्च हो सकता है।
सोशल मीडिया पर दुबई की जो तस्वीर दिखाई देती है, वह भी पूरी जिंदगी को नहीं दर्शाती। वहां रहने वाले लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी में काम के घंटे, ट्रैफिक, किराया और खर्च जैसी चुनौतियां भी होती हैं। इसलिए विदेश में नौकरी का फैसला केवल चमक-दमक देखकर लेना समझदारी नहीं है।
दरअसल, विदेश में नौकरी का मूल्यांकन करते समय सबसे जरूरी सवाल यह होना चाहिए कि सभी खर्च निकालने के बाद कितनी बचत होती है और उस बचत के बदले जीवन की गुणवत्ता कैसी है। सिर्फ रुपये में सैलरी बदलकर देखना आकर्षक लग सकता है, लेकिन असली तस्वीर खर्च और बचत का हिसाब लगाने के बाद ही सामने आती है। दुबई जाने का सपना देखने वालों के लिए यही सबसे जरूरी रियलिटी चेक है।