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आसमान में दिखने वाली सफेद लाइन आखिर कैसे है बनती? रॉकेट से नहीं कोई लेना-देना, बचपन से हो रही लोगों से मिस्टेक!

 

आसमान में उड़ते विमान के पीछे दिखाई देने वाली लंबी सफेद लाइन को आपने भी कई बार देखा होगा। बचपन में इस लाइन को लेकर तरह-तरह की बातें सुनने को मिलती थीं। कुछ लोग इसे धुआं समझते थे तो कुछ का मानना था कि विमान आसमान में कोई केमिकल छोड़ रहा है। कई बार इसे रॉकेट या किसी दूसरी रहस्यमयी चीज से भी जोड़ दिया जाता है। लेकिन असल में आसमान में बनने वाली यह सफेद लकीर बेहद सामान्य वैज्ञानिक प्रक्रिया का नतीजा होती है और इसका रॉकेट से कोई लेना-देना नहीं होता।

विमान के पीछे बनने वाली इस सफेद लाइन को वैज्ञानिक भाषा में कॉन्ट्रेल यानी Contrail कहा जाता है। यह शब्द Condensation Trail से बना है। आमतौर पर यह घटना ऊंचाई पर उड़ने वाले विमानों के पीछे दिखाई देती है। विमान के इंजन से निकलने वाली गर्म गैसों में जलवाष्प यानी पानी के भाप के रूप में मौजूद होता है। जब यह गर्म और नम गैस बेहद ठंडी ऊपरी वायुमंडलीय हवा के संपर्क में आती है, तो पानी की भाप तेजी से संघनित होकर बेहद छोटी बूंदों या बर्फ के क्रिस्टल में बदल सकती है।

इन्हीं बेहद छोटे बर्फ के कणों के समूह की वजह से हमें आसमान में सफेद रेखा दिखाई देती है। यानी जिसे लोग धुआं समझ लेते हैं, वह सामान्य परिस्थितियों में धुएं की तरह कोई ठोस पदार्थ नहीं होता। यह मुख्य रूप से पानी से बनने वाले छोटे कणों या बर्फ के क्रिस्टल की वजह से दिखाई देता है।

अब सवाल उठता है कि कुछ सफेद लाइनें कुछ ही देर में गायब क्यों हो जाती हैं, जबकि कुछ काफी देर तक आसमान में बनी रहती हैं? इसका जवाब भी मौसम और वातावरण में छिपा है। जिस ऊंचाई पर विमान उड़ रहा है, वहां हवा का तापमान और नमी इस प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं। यदि ऊपरी वातावरण में नमी कम है तो कॉन्ट्रेल जल्दी गायब हो सकता है। वहीं पर्याप्त नमी मौजूद होने पर बर्फ के क्रिस्टल लंबे समय तक बने रह सकते हैं और हवा के साथ फैलकर सफेद बादल जैसी आकृति भी बना सकते हैं।

इसी वजह से कभी आसमान में विमान के पीछे एक पतली सफेद लाइन दिखाई देती है और थोड़ी देर बाद वह गायब हो जाती है। कई बार इसके उलट एक लाइन काफी लंबे समय तक नजर आती रहती है और धीरे-धीरे चौड़ी होती जाती है। इसे देखकर लोगों को लगता है कि विमान ने आसमान में कुछ छोड़ दिया है, जबकि इसके पीछे वातावरण की नमी और तापमान की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

बचपन से इस सफेद लकीर को लेकर लोगों के बीच कई तरह की गलत धारणाएं रही हैं। विमान के पीछे दिखने वाली रेखा को रॉकेट की गतिविधि से जोड़ना भी ऐसी ही एक गलतफहमी है। रॉकेट का प्रक्षेपण और विमान का सामान्य उड़ान मार्ग पूरी तरह अलग घटनाएं हैं। इसलिए हर सफेद लकीर को रॉकेट या किसी रहस्यमयी गतिविधि से जोड़ना वैज्ञानिक रूप से सही नहीं है।

दरअसल, कॉन्ट्रेल आधुनिक विमानन में कोई असामान्य घटना नहीं है। ऊंचाई पर उड़ने वाले विमानों के पीछे इसका दिखाई देना मौसम और वातावरण की परिस्थितियों पर निर्भर करता है। वैज्ञानिक लंबे समय से इसका अध्ययन करते आए हैं, क्योंकि ये कृत्रिम बादलों की तरह व्यवहार कर सकते हैं और वायुमंडलीय परिस्थितियों के आधार पर कुछ समय तक बने रह सकते हैं।

तो अगली बार जब आपको आसमान में विमान के पीछे लंबी सफेद लाइन दिखाई दे, तो उसे देखकर हैरान होने की जरूरत नहीं है। वह कोई रहस्यमयी निशान नहीं, बल्कि विमान के इंजन से निकलने वाली जलवाष्प और ऊपरी वायुमंडल की ठंडी परिस्थितियों के बीच होने वाली वैज्ञानिक प्रक्रिया का परिणाम है। यानी बचपन से जिस सफेद लकीर को लेकर तरह-तरह की बातें सुनीं, उसकी असली वजह विज्ञान है, कोई रॉकेट नहीं।