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700 साल पुराने पेड़ के लिए बदला नक्शा, लेकिन काट दिए 932 पेड़? सूरत का अजब-गजब मामला
 

 

गुजरात के सूरत से जुड़ा एक मामला पर्यावरण संरक्षण और विकास परियोजनाओं के बीच संतुलन को लेकर चर्चा में है। यहां करीब 700 साल पुराने पेड़ को बचाने के लिए परियोजना का नक्शा बदलने की बात सामने आई, लेकिन दूसरी ओर 932 पेड़ों की कटाई का मामला भी सवालों के घेरे में है। इस घटनाक्रम ने लोगों के बीच यह बहस तेज कर दी है कि विकास कार्यों के दौरान पुराने और ऐतिहासिक पेड़ों को बचाने के प्रयास कितने प्रभावी साबित हो रहे हैं।

700 साल पुराने पेड़ के लिए बदला गया नक्शा

इस मामले में सबसे ज्यादा ध्यान करीब 700 साल पुराने पेड़ को बचाने के कथित प्रयास ने खींचा है। बताया जा रहा है कि पेड़ को नुकसान से बचाने के लिए परियोजना की योजना या नक्शे में बदलाव किया गया। इतने पुराने पेड़ का संरक्षण पर्यावरण और स्थानीय विरासत, दोनों के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा सकता है।

हालांकि, परियोजना का नाम, पेड़ की प्रजाति और नक्शे में किए गए बदलाव का पूरा विवरण स्पष्ट होना जरूरी है, ताकि इस कदम के पीछे की परिस्थितियों को ठीक से समझा जा सके।

मेट्रो फेज-1 में 932 पेड़ों की कटाई का प्रस्ताव

टीवी9 हिंदी की रिपोर्ट के अनुसार, सूरत मेट्रो के 40.35 किलोमीटर लंबे फेज-1 कॉरिडोर और खजोद स्थित डिपो क्षेत्र में किए गए सर्वे में करीब 2,500 पेड़ प्रभावित पाए गए थे। इनमें से 932 पेड़ों को काटने और 1,161 पेड़ों को दूसरी जगह स्थानांतरित करने का प्रस्ताव था

यह आंकड़ा इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि एक ओर ऐतिहासिक पेड़ को बचाने के लिए मेट्रो का अलाइनमेंट बदलने की बात सामने आई, वहीं दूसरी ओर सैकड़ों पेड़ों की कटाई की योजना भी बनाई गई।

क्या नए पौधे पुराने पेड़ों की भरपाई कर पाएंगे?

रिपोर्ट के मुताबिक, क्षतिपूर्ति के तौर पर खजोद स्थित ड्रीम सिटी डिपो परिसर में 3,000 से अधिक नए पौधे लगाने की बात कही गई है। 

हालांकि, नए पौधे लगाना और सैकड़ों साल पुराने पेड़ों को बचाना एक जैसी बात नहीं है। पुराने पेड़ समय के साथ विकसित हुए पारिस्थितिकी तंत्र का हिस्सा होते हैं। नए पौधों को उस स्तर तक पहुंचने में लंबा समय लग सकता है।

इसलिए पर्यावरण संरक्षण के लिहाज से केवल पौधारोपण की संख्या ही नहीं, बल्कि लगाए गए पौधों के जीवित रहने, उनकी देखभाल और पेड़ों की कटाई को कम करने के प्रयासों का मूल्यांकन भी जरूरी है।

विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन जरूरी

सूरत मेट्रो जैसी सार्वजनिक परिवहन परियोजनाएं शहर में यातायात को बेहतर बनाने में अहम भूमिका निभा सकती हैं। लेकिन इनके निर्माण के दौरान पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव को कम करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

अडाजन के 700 साल पुराने ‘चोर आमली’ पेड़ को बचाने के लिए किए गए प्रयास यह दिखाते हैं कि जरूरत पड़ने पर परियोजना की योजना में बदलाव संभव है। अब सवाल यह है कि क्या ऐसे विकल्पों पर दूसरे पेड़ों के मामले में भी पर्याप्त विचार किया गया?

सूरत का यह मामला विकास परियोजनाओं में पर्यावरणीय आकलन, पारदर्शिता और जवाबदेही की जरूरत को रेखांकित करता है। असली चुनौती केवल एक ऐतिहासिक पेड़ को बचाने की नहीं, बल्कि विकास के साथ शहर की हरियाली को भी सुरक्षित रखने की है।