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कभी रौनक का केंद्र रहा अंसल प्लाजा आज वीरान: दिल्ली के पहले मॉल की डरावनी और दर्दनाक कहानी

 

दिल्ली के शॉपिंग कल्चर की शुरुआत जिन जगहों से मानी जाती है, उनमें से एक नाम Ansal Plaza का भी है। एक समय था जब यह मॉल राजधानी का सबसे प्रीमियम और सबसे चर्चित शॉपिंग डेस्टिनेशन माना जाता था। लोग यहां सिर्फ खरीदारी के लिए नहीं, बल्कि घूमने, मिलने और समय बिताने के लिए आते थे।

लेकिन आज तस्वीर बिल्कुल बदल चुकी है। जहां कभी दुकानों की रौनक, संगीत और भीड़भाड़ होती थी, वहां अब खाली गलियारे, बंद शटर और सन्नाटा दिखाई देता है। स्थानीय लोगों के अनुसार, शाम ढलते ही यह जगह और भी ज्यादा वीरान और डरावनी लगने लगती है।

1990 के दशक में खोला गया अंसल प्लाजा दिल्ली का पहला बड़े स्तर का ओपन-एयर मॉल माना जाता है। उस समय यह आधुनिक भारत के बदलते लाइफस्टाइल का प्रतीक था। यहां ब्रांडेड स्टोर्स, फूड कोर्ट और खुला एम्फीथिएटर लोगों को एक नया अनुभव देते थे। परिवार और युवा यहां घंटों समय बिताते थे।

लेकिन समय के साथ दिल्ली में कई नए और आधुनिक मॉल्स खुल गए, जिनमें बेहतर सुविधाएं, मल्टीप्लेक्स और बड़े ब्रांड्स शामिल थे। धीरे-धीरे अंसल प्लाजा की चमक फीकी पड़ने लगी। दुकानदारों ने यहां से अपना कारोबार समेटना शुरू कर दिया और ग्राहक भी नए विकल्पों की ओर बढ़ गए।

आज स्थिति यह है कि मॉल का बड़ा हिस्सा खाली पड़ा है। कुछ गिने-चुने ऑफिस और दुकानें ही यहां सक्रिय हैं। कई हिस्सों में मरम्मत न होने के कारण इमारत भी पुरानी और जर्जर नजर आती है।

स्थानीय लोगों के बीच इस मॉल को लेकर कई तरह की कहानियां भी सुनाई देती हैं। कुछ लोग इसे “भूतिया” जगह कहते हैं, हालांकि इसकी कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं है। खालीपन और अंधेरे के कारण रात के समय यहां एक अजीब सा सन्नाटा महसूस होता है, जो लोगों के मन में डर और जिज्ञासा दोनों पैदा करता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि अंसल प्लाजा का पतन सिर्फ एक इमारत की कहानी नहीं है, बल्कि यह बदलते शहरी बाजार और उपभोक्ता व्यवहार का उदाहरण है। जैसे-जैसे दिल्ली में नए और बड़े मॉल विकसित हुए, पुराने ढांचे पीछे छूटते गए।

आज अंसल प्लाजा एक ऐसे दौर की याद दिलाता है जब यह राजधानी के सामाजिक जीवन का केंद्र हुआ करता था। अब यह जगह अपने सुनहरे दिनों की गवाही देती खड़ी है — कभी रौनक से भरी, आज पूरी तरह सन्नाटे में डूबी हुई।