भारत में करेंसी मुख्य रूप से नोट और सिक्कों के रूप में इस्तेमाल होती है। समय के साथ दोनों के डिजाइन, आकार और निर्माण सामग्री में काफी बदलाव आया है। खासतौर पर पुराने और नए सिक्कों को देखकर एक अंतर तुरंत नजर आता है कि आज के कई सिक्के पहले की तुलना में आकार और वजन में छोटे हैं। इसके पीछे सिर्फ डिजाइन बदलना वजह नहीं है, बल्कि धातु की कीमत, सिक्के बनाने की लागत और आर्थिक जरूरतें भी बड़ी वजह रही हैं।
पुराने सिक्के भारी और बड़े क्यों होते थे?
आजादी के बाद भारत में सिक्कों के निर्माण में निकल, कॉपर-निकेल और दूसरी धातुओं का इस्तेमाल किया जाता था। उस दौर में कई सिक्के वजन में काफी भारी हुआ करते थे।
उदाहरण के लिए शुरुआती दशमलव श्रृंखला में एक रुपये का सिक्का करीब 10 ग्राम वजन और 28 मिलीमीटर व्यास का था। 50 पैसे का सिक्का 5 ग्राम और 24 मिलीमीटर का था। यानी सिक्कों का आकार और वजन आज के कई सिक्कों की तुलना में ज्यादा था।
धातु महंगी हुई तो बदली रणनीति
सिक्कों के छोटे होने की सबसे बड़ी वजहों में से एक मेटल की कीमत बढ़ना है। जब सिक्के बनाने में इस्तेमाल होने वाली धातुओं की कीमत बढ़ी, तो पुराने भारी सिक्कों को उसी सामग्री से बनाना सरकार के लिए महंगा पड़ने लगा।
RBI के अनुसार, समय के साथ सिक्कों की नीति में यह भी ध्यान रखा गया कि उनकी धातु की कीमत कहीं उनके अंकित मूल्य से ज्यादा न हो जाए। इसी कारण सिक्कों में इस्तेमाल होने वाली धातु और वजन में बदलाव किए गए।
स्टेनलेस स्टील ने बदला सिक्कों का रूप
धीरे-धीरे पुराने कॉपर-निकेल जैसे मिश्रधातुओं की जगह फेरिटिक स्टेनलेस स्टील का इस्तेमाल बढ़ा। 1988 में 10, 25 और 50 पैसे के स्टेनलेस स्टील सिक्के और 1992 में एक रुपये का स्टेनलेस स्टील सिक्का पेश किया गया। बाद में दूसरे मूल्यवर्गों में भी धातु और डिजाइन में बदलाव किए गए।
स्टेनलेस स्टील अपेक्षाकृत कम लागत और टिकाऊपन के कारण सिक्कों के लिए उपयोगी साबित हुआ। इससे सिक्कों का वजन कम करने और निर्माण लागत को नियंत्रित करने में मदद मिली।
पुराने एक रुपये और आज के एक रुपये में अंतर
समय के साथ एक रुपये के सिक्के में भी बड़ा बदलाव आया। RBI के संग्रहालय के अनुसार, शुरुआती दौर में एक रुपये के सिक्के का वजन 10 ग्राम और आकार 28 मिलीमीटर था। बाद की श्रृंखलाओं में वजन और आकार घटते गए। 2011 की श्रृंखला में एक रुपये का फेरिटिक स्टेनलेस स्टील सिक्का 3.79 ग्राम वजन और 22 मिलीमीटर व्यास का था।
यानी सिर्फ डिजाइन ही नहीं बदला, बल्कि सिक्के की मेटल संरचना, वजन और आकार भी आर्थिक जरूरतों के हिसाब से बदले गए।
सिक्कों को छोटा करने की एक और वजह
सिक्के जितने भारी होंगे, उनकी बड़ी संख्या को ढोने, रखने और संभालने में उतनी ही परेशानी होगी। इसलिए सिक्कों के निर्माण में आकार और वजन को व्यावहारिक बनाए रखना भी जरूरी है।
इसके अलावा सरकार समय-समय पर यह भी तय करती है कि कौन से मूल्यवर्ग के सिक्के चलन में रखने जरूरी हैं। कम उपयोग वाले छोटे मूल्यवर्ग के कई सिक्के धीरे-धीरे चलन से बाहर किए गए। 25 पैसे का सिक्का भी 30 जून 2011 से वैध मुद्रा नहीं रहा।
यानी सिर्फ दिखने का बदलाव नहीं
इसलिए अगर आपको लगता है कि पुराने सिक्के बड़े और भारी होते थे, जबकि आज के सिक्के छोटे और हल्के हैं, तो इसके पीछे कई आर्थिक और तकनीकी कारण हैं। धातु की बढ़ती कीमत, सिक्के बनाने की लागत, टिकाऊपन, वजन कम करने की जरूरत और बदलती अर्थव्यवस्था ने भारतीय सिक्कों का रूप लगातार बदला है।
आज सिक्कों की डिजाइन और धातु का निर्धारण भारत सरकार करती है, जबकि RBI उनकी आपूर्ति और वितरण की व्यवस्था संभालता है।

