सड़क डूबी तो नाव बनी स्कूल बस! बाढ़ के बीच पढ़ने निकल पड़े मासूम, देखें वीडियो
किताबें हाथ में हैं, पढ़ने का जज्बा दिल में है, लेकिन स्कूल तक पहुंचने का रास्ता पानी में डूब चुका है। बिहार और असम के कई इलाकों में बाढ़ ने बच्चों की पढ़ाई को मुश्किल ही नहीं, बल्कि जोखिम भरा बना दिया है। जिन बच्चों को सुरक्षित रास्तों से स्कूल पहुंचना चाहिए, उन्हें अब पानी के बीच नाव का सहारा लेना पड़ रहा है।सुबह होते ही बच्चे अपने स्कूल बैग और किताबें लेकर घर से निकलते हैं, लेकिन स्कूल तक पहुंचने के लिए उन्हें सड़क या पक्के रास्ते की जगह नाव पर बैठना पड़ता है। कई जगहों पर बाढ़ का पानी इतना फैल चुका है कि आने-जाने के सामान्य रास्ते पूरी तरह जलमग्न हो गए हैं।
किताबें हाथ में हैं, लेकिन रास्ता पानी में डूबा है।
— Farooqui (@Farooqui0M) September 12, 2026
बच्चे नाव पर बैठकर स्कूल पहुंच रहे हैं और सिस्टम शायद अब भी फाइलों की “नाव” पर सवार है।
बिहार और असम के इन बच्चों के लिए शिक्षा कोई सुविधा नहीं, रोज़ का जोखिम बन चुकी है। सवाल सिर्फ बाढ़ का नहीं—बच्चों की सुरक्षा और शिक्षा के… pic.twitter.com/2z8fENYpHr
किताबों से ज्यादा जरूरी हो गई नाव
इन बच्चों के लिए स्कूल जाना अब रोज की चुनौती बन चुका है। एक हाथ में किताबें हैं और दूसरी तरफ पानी का डर। नाव पर बैठकर बच्चे बाढ़ के बीच से गुजरते हुए स्कूल पहुंचने की कोशिश करते हैं।
बारिश और बाढ़ की इस स्थिति में बच्चों की सुरक्षा सबसे बड़ा सवाल बनकर सामने आ रही है। आखिर जिन बच्चों के हाथों में किताबें और कॉपियां होनी चाहिए, उन्हें रोज अपनी जान जोखिम में डालकर स्कूल क्यों जाना पड़ रहा है?
शिक्षा सुविधा नहीं, रोज का संघर्ष
शिक्षा हर बच्चे का अधिकार है, लेकिन बाढ़ प्रभावित इलाकों में हालात ऐसे हैं कि बच्चों के लिए स्कूल पहुंचना ही सबसे बड़ी चुनौती बन गया है। कई परिवारों के सामने बच्चों की पढ़ाई जारी रखने और उनकी सुरक्षा के बीच चुनाव जैसी स्थिति पैदा हो गई है।
बाढ़ का पानी सिर्फ सड़कें और रास्ते नहीं डुबोता, बल्कि इसका असर बच्चों की पढ़ाई और उनके भविष्य पर भी पड़ता है। स्कूल तक पहुंचने में अगर हर दिन खतरा हो, तो बच्चों की नियमित शिक्षा कैसे जारी रहेगी, यह बड़ा सवाल है।
सिस्टम से उठ रहे सवाल
बिहार और असम में बाढ़ कोई नई समस्या नहीं है। हर साल बारिश के मौसम में कई इलाकों में जलभराव और बाढ़ की स्थिति पैदा होती है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या बच्चों के लिए सुरक्षित आवागमन और पढ़ाई की कोई स्थायी व्यवस्था नहीं हो सकती?
कागजों पर योजनाएं और व्यवस्थाएं अपनी जगह हैं, लेकिन जमीन पर तस्वीर कुछ और दिखाई देती है। बच्चे नाव पर बैठकर स्कूल जाने को मजबूर हैं और व्यवस्था अब भी फाइलों के सहारे चलती नजर आ रही है।
सवाल सिर्फ बाढ़ का नहीं, बच्चों के भविष्य का है
यह तस्वीर सिर्फ बाढ़ की भयावहता नहीं दिखाती, बल्कि यह भी सवाल पूछती है कि आपदा के बीच बच्चों की शिक्षा और सुरक्षा की जिम्मेदारी आखिर किसकी है?
इन बच्चों के हाथों में किताबें हैं, आंखों में बेहतर भविष्य का सपना है और स्कूल जाने की इच्छा भी है। जरूरत सिर्फ इतनी है कि उन्हें स्कूल तक पहुंचने के लिए हर दिन अपनी जान जोखिम में न डालनी पड़े।
बाढ़ का पानी एक दिन उतर जाएगा, लेकिन अगर इसी वजह से बच्चों की पढ़ाई बार-बार रुकती रही, तो उनके भविष्य पर पड़े असर को खत्म करना इतना आसान नहीं होगा।

