UPI MDR Viral Post: दही वड़ा बेचने वाले से बातचीत का दावा, पेट्रोल-डीजल और सिलेंडर की कीमतों पर उठाया सवाल
सोशल मीडिया पर एक पोस्ट तेजी से वायरल हो रही है, जिसमें दही वड़ा बेचने वाले एक दुकानदार से हुई कथित बातचीत का जिक्र किया गया है. पोस्ट में छोटे कारोबारियों की कमाई, नोटबंदी, GST, UPI और ईंधन की कीमतों जैसे मुद्दों को जोड़ते हुए कई सवाल उठाए गए हैं.
वायरल पोस्ट के मुताबिक, लेखक सुबह दही वड़ा खाने के लिए एक दुकान पर पहुंचा था. ग्राहकों के चले जाने के बाद उसने दुकानदार से उसकी रोजाना कमाई के बारे में बातचीत की. पोस्ट में दुकानदार के हवाले से दावा किया गया है कि दिनभर मेहनत करने के बावजूद उसकी कमाई करीब 2,000 रुपये तक ही रहती है.
नोटबंदी और GST का भी किया गया जिक्र
दही बड़े वाले ने तो सारा कॉन्सेप्ट क्लियर कर दिया।
— चाणक्य (@ChanakyaSpeaksX) September 16, 2026
सुबह दही बड़े खाने चला गया। दही बड़े वाले के पास ठीक ठाक कस्टमर थे।
सब खा के चले गए तो मैं बात करने लगा कि भाई कितना कमा लेते हो रोज का...?
भाई तो जैसे भरा बैठा था।
भैया हमारी कमाई कहां हजम होती है सरकार को
पूरे दिन मेहनत… pic.twitter.com/ii5GYVzrep
पोस्ट में दुकानदार की कथित नाराजगी का जिक्र करते हुए कहा गया है कि छोटे कारोबारियों को पहले नोटबंदी और उसके बाद GST से जुड़ी परेशानियों का सामना करना पड़ा. पोस्ट के अनुसार, कोरोना महामारी के बाद कारोबार में सुधार शुरू हुआ तो डिजिटल भुगतान से जुड़े अतिरिक्त शुल्क को लेकर भी चिंता सामने आने लगी.
हालांकि, पोस्ट में कही गई इन बातों को संबंधित दुकानदार का व्यक्तिगत पक्ष बताया गया है और इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं की गई है.
UPI MDR को लेकर बातचीत का दावा
वायरल पोस्ट में लेखक और दुकानदार के बीच UPI MDR को लेकर बातचीत का भी जिक्र है. लेखक ने कथित तौर पर दुकानदार को समझाने की कोशिश की कि 0.4 प्रतिशत MDR का उल्लेखित शुल्क केवल कुछ विशेष परिस्थितियों में लागू होता है और इसे लेकर दुकानदार को चिंता नहीं करनी चाहिए.
इसके जवाब में दुकानदार द्वारा पेट्रोल-डीजल और गैस सिलेंडर की कीमतों का उदाहरण दिए जाने का दावा किया गया है. उसने कथित तौर पर सवाल किया कि अगर किसी टैक्स या शुल्क का भुगतान कंपनी करती है, तो उसका लाभ उपभोक्ताओं को सीधे कम कीमत के रूप में क्यों नहीं मिलता.
सोशल मीडिया पर चर्चा
पोस्ट के अंत में लेखक ने दावा किया है कि दुकानदार के सवालों का उसके पास कोई जवाब नहीं था और उसने दही वड़े का भुगतान नकद में कर दिया.
यह पूरी घटना सोशल मीडिया पोस्ट में किए गए दावों और लेखक द्वारा बताई गई बातचीत पर आधारित है. ऐसे में इसमें मौजूद व्यक्तिगत अनुभव, कमाई के आंकड़े और शुल्क से जुड़े दावों को स्वतंत्र रूप से सत्यापित तथ्यों के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए. पोस्ट ने छोटे कारोबारियों की लागत, डिजिटल भुगतान और रोजमर्रा की महंगाई को लेकर सोशल मीडिया पर बहस जरूर छेड़ दी है.

