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विश्व की इस मशहूर दरगाह पर रात नहीं दिन में लगती है भूतों की अदालत, कैमरे में कैद हुआ लाइव सीन

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दुनिया में रहस्यों की कोई कमी नहीं है, लेकिन जब किसी पवित्र दरगाह पर आत्माओं की मौजूदगी की बातें सामने आएं, वो भी दिन के उजाले में, तो मामला और भी चौंकाने वाला हो जाता है। ऐसा ही रहस्यमयी और हैरान कर देने वाला मामला सामने आया है राजस्थान की मशहूर "करबला दरगाह" से, जहां माना जाता है कि दिन में लगती है भूतों की अदालत

दिन में क्यों लगती है आत्माओं की अदालत?

अक्सर भूत-प्रेत की कहानियां रात के अंधेरे से जुड़ी होती हैं, लेकिन इस दरगाह का मामला अलग है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, यहां सूरज की रौशनी में भी ऐसी रूहें आती हैं जो इंसानों के शरीर में दाखिल हो चुकी होती हैं। कई बार लोगों ने यहां अजीबो-गरीब हरकतें करते हुए लोगों को देखा है – कोई चीखता है, कोई रोता है, तो कोई खुद को ज़ंजीरों से छुड़ाने की कोशिश करता है।

दरगाह के मौलवी और संरक्षक बताते हैं कि यहां आत्माओं से ग्रसित लोगों को उनके परिजन लेकर आते हैं। वे मानते हैं कि दरगाह के परिसर में मौजूद पवित्र ऊर्जा और वजीफों की ताकत से बुरी आत्माएं कांपने लगती हैं और खुद दरगाह छोड़ देती हैं।

कैमरे में कैद हुआ लाइव सीन

हाल ही में सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हुआ जिसमें एक महिला दिन के उजाले में दरगाह परिसर में अजीब ढंग से चीखती-चिल्लाती दिखाई दी। वीडियो में देखा जा सकता है कि जब मौलवी उसे कुरान की आयतें पढ़कर सुनाते हैं, तो वह एकदम उग्र हो जाती है, लेकिन कुछ ही देर में शांत होकर बेहोश हो जाती है।

इस वीडियो को देखकर लोगों ने कहा कि यह भूतों की अदालत का साक्षात प्रमाण है। कई लोग इसे "रूहानी इलाज की दरगाह" भी कहते हैं, जहां दवाओं से नहीं, बल्कि दुआओं से इलाज होता है।

स्थानीय लोग क्या कहते हैं?

दरगाह के आसपास के लोग इस चमत्कार को वर्षों से देख रहे हैं। उनका मानना है कि यहां की मिट्टी, हवा और दीवारों में एक अलग ही आध्यात्मिक शक्ति है। लोग कहते हैं – "यहां कोई झूठ नहीं चलता, जो सच्चा होता है वही दरगाह के आंगन में टिक पाता है। आत्माएं खुद यहां से निकल जाती हैं, किसी तंत्र-मंत्र की जरूरत नहीं पड़ती।"

वैज्ञानिकों की भी रुचि

कुछ मनोवैज्ञानिक और वैज्ञानिकों ने भी इस रहस्यमयी घटनास्थल पर अध्ययन किया है। उनका मानना है कि यह सब अंडरकॉन्शियस माइंड और मास हिस्टीरिया के प्रभाव भी हो सकते हैं, लेकिन स्थानीय विश्वास और दरगाह के अनुभव इन वैज्ञानिकों को भी उलझन में डाल देते हैं।

निष्कर्ष

करबला दरगाह जैसी जगहें विज्ञान और विश्वास के बीच की उस महीन रेखा पर खड़ी होती हैं, जहां तर्क थम जाते हैं और आस्था बोलने लगती है। दिन में लगने वाली यह "भूतों की अदालत" सिर्फ डर की नहीं, बल्कि रूहानी इलाज और दुआओं की ताकत का भी प्रतीक बन चुकी है।

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