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अनोखा है ये मेला, जहां गुलाल लगाकर दुल्हन को भगाकर ले जाते हैं लोग, अब लोगों ने शुरु किया विरोध

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भारत के विभिन्न हिस्सों में विभिन्न जाति, धर्म और संस्कृति के लोग अपनी अनोखी परंपराओं का पालन करते हैं। इन परंपराओं में से एक है भगोरिया मेला, जो मध्य प्रदेश के आदिवासी समुदाय द्वारा हर साल मनाया जाता है। इस मेले की खासियत यह है कि इसमें दूल्हा अपनी दुल्हन को भगाकर ले जाता है, जो एक अनूठी और विवादित शादी की परंपरा बन गई है।

भगोरिया मेला: प्रेम का पर्व

भगोरिया मेला पश्चिमी मध्य प्रदेश के आदिवासी क्षेत्रों में आयोजित किया जाता है, जिसमें युवक और युवतियां अपनी परंपराओं और सांस्कृतिक रीति-रिवाजों का पालन करते हुए अपने जीवनसाथी का चुनाव करते हैं। इस साल यह मेला 14 मार्च से शुरू होगा और इसे आदिवासी युवाओं का 'प्रेम पर्व' माना जाता है। हालांकि, अब इस मेले को लेकर कुछ विवाद भी उत्पन्न हो गए हैं।

मेले की परंपरा

भगोरिया मेला हाट झाबुआ, धार, खरगोन, और बड़वानी जैसे आदिवासी बहुल जिलों में आयोजित होता है, जहां देश-विदेश से हजारों पर्यटक भी शामिल होते हैं। यह मेला होली के पहले हर साल आयोजित होता है। मेले की परंपरा सदियों पुरानी है, जिसमें आदिवासी युवक अपनी प्रेमिका को पान का बीड़ा देकर प्रेम का इजहार करते हैं और उसके चेहरे पर गुलाल लगा देते हैं। युवती का बीड़ा स्वीकार करना इसका प्रतीक होता है कि उसने युवक के प्रेम प्रस्ताव को स्वीकार किया है।

इसके बाद, दोनों प्रेमी-प्रेमिका भगोरिया मेले से भाग जाते हैं, और तब तक घर नहीं लौटते जब तक उनके परिवार उनकी शादी के लिए राजी नहीं हो जाते। यह एक अनोखी और रोमांचक परंपरा है, जो इस आदिवासी समुदाय के जीवन का अहम हिस्सा बनी हुई है।

विरोध की आवाज़

हालांकि, इस अनूठी परंपरा को लेकर अब विवाद भी उठने लगे हैं। खासकर आधुनिकता की ओर बढ़ते हुए आदिवासी समुदाय के युवा अब इस परंपरा का विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि भगोरिया मेला अब गलत तरीके से पेश किया जा रहा है और इसकी पारंपरिक छवि को नुकसान पहुंचाया जा रहा है।

नयी पीढ़ी के आदिवासी युवाओं का यह भी आरोप है कि भगोरिया मेले का चित्रण अब बहुत बदल चुका है, और यह केवल एक सांस्कृतिक पर्व के बजाय एक विवादित परंपरा बनकर रह गया है। इसके बावजूद, कुछ लोग इसे आदिवासी समाज की खुशहाली और एकता का प्रतीक मानते हैं।

निष्कर्ष

भगोरिया मेला एक सांस्कृतिक पर्व है जो आदिवासी समुदाय के उल्लास और जीवंतता को दर्शाता है। हालांकि इस परंपरा में समय के साथ बदलाव आ रहा है, लेकिन यह आदिवासी समाज की समाजिक और सांस्कृतिक धरोहर का महत्वपूर्ण हिस्सा बना हुआ है। समय के साथ इसकी प्रस्तुति और सामाजिक सोच में बदलाव आ सकता है, लेकिन यह मेला अपने ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व को बनाए रखेगा।

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