चीन के इस टॉपर ने लगाया उबले आलू का ठेला, कमाई का खेल समझा तो छोड़ दिया क्लासरूम
पढ़ोगे-लिखोगे तो बनोगे नवाब" – ये कहावत भारतीय समाज में पीढ़ियों से सुनाई जाती रही है। माना जाता है कि पढ़ाई से इंसान तरक्की करता है, अच्छी नौकरी पाता है और एक बेहतर जीवन जीता है। लेकिन आज के समय में जब ज़िंदगी के रास्ते और प्राथमिकताएं बदल रही हैं, तो यह कहावत हर किसी पर सटीक नहीं बैठती। खासकर तब जब एक टॉपर छात्र अपने बेहतरीन अकादमिक रिकॉर्ड के बावजूद किताबें छोड़कर आलू बेचने लगे!
चीन से सामने आई एक ऐसी ही कहानी इन दिनों सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बनी हुई है। 24 साल के फेइ यु नाम के युवक ने सबको चौंका दिया है, जब पता चला कि यह टॉपर छात्र अब सड़कों पर मैश्ड पोटैटो का ठेला लगा रहा है। इस खबर के सामने आते ही लोगों के मन में सवाल उठने लगे – आखिर ऐसा क्या हुआ जो इतने होनहार छात्र को यह रास्ता चुनना पड़ा?
गरीबी में पली-बढ़ी, लेकिन मेहनत से हासिल किया मुकाम
फेइ यु एक बेहद गरीब परिवार से ताल्लुक रखते हैं, लेकिन उन्होंने कभी हालात के आगे हार नहीं मानी। पढ़ाई में बेहद तेज होने के चलते उन्होंने चीन की प्रतिष्ठित सिचुआन यूनिवर्सिटी में दाखिला लिया। यही नहीं, साल 2022 में मास्टर्स के लिए उन्हें सीधे फुदान यूनिवर्सिटी में भी प्रवेश मिला, वो भी बिना किसी टेस्ट के – क्योंकि उनके ग्रेड इतने शानदार थे।
टीचर की वजह से डिप्रेशन में पहुंचे
सबकुछ ठीक चल रहा था, लेकिन अचानक उनकी ज़िंदगी ने यू-टर्न ले लिया। फेइ ने बताया कि फुदान यूनिवर्सिटी में एक टीचर के व्यवहार के कारण वे गहरे डिप्रेशन में चले गए। उन्होंने बताया,
"मैं इतनी बुरी मानसिक स्थिति में था कि मुझे रातभर नींद नहीं आती थी। हर दिन एक बोझ की तरह लगने लगा।"
इस डिप्रेशन की वजह से उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी और एक साल का ब्रेक ले लिया।
अमेरिका से मिली स्कॉलरशिप भी गई हाथ से
बाद में फेइ ने फैसला लिया कि वे अमेरिका में पीएचडी करेंगे। उन्होंने एक यूनिवर्सिटी की स्कॉलरशिप के लिए परीक्षा दी और सफल भी हो गए। लेकिन अमेरिका और चीन के बीच चल रहे टैरिफ वॉर के चलते उनके लिए यह पढ़ाई अब बेहद महंगी हो गई थी, जिसे वह अफोर्ड नहीं कर सकते थे। आखिरकार, उन्होंने इस सपने को भी अलविदा कह दिया।
ठेले पर मिला सुकून
इन सभी संघर्षों के बाद फेइ यु ने फैसला किया कि वे अब अपनी आज़ादी के साथ ज़िंदगी जिएंगे। उन्होंने मैश्ड पोटैटो का ठेला लगाना शुरू किया। फेइ बताते हैं कि वे हर दिन 8-9 घंटे मेहनत करते हैं और रोज़ करीब 8000 रुपये (लगभग 700 युआन) की कमाई कर लेते हैं।
उनका कहना है,
"अब मैं खुश हूं। मैं जो कर रहा हूं, उसमें मुझे शांति मिलती है। कोई दबाव नहीं, कोई टेंशन नहीं।"
समाज की सोच पर सवाल
फेइ यु की यह कहानी कई लोगों को सोचने पर मजबूर कर रही है कि क्या पढ़ाई से वाकई एक बेहतर भविष्य सुनिश्चित होता है? क्या मानसिक स्वास्थ्य की अनदेखी हमारे शिक्षा तंत्र की सबसे बड़ी विफलता नहीं है?
सोशल मीडिया पर इस खबर को लेकर तमाम प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। कुछ लोगों ने फेइ की ईमानदारी और साहस की तारीफ की है, वहीं कुछ ने यह भी कहा कि यह शिक्षा व्यवस्था की विफलता है, जो एक होनहार छात्र को इस कगार पर ले आई।
निष्कर्ष
फेइ यु की कहानी हमें यह सिखाती है कि ज़िंदगी सिर्फ डिग्रियों और डेस्क जॉब तक सीमित नहीं है। असल मायने में ज़िंदगी वही है जहां इंसान को सुकून और संतोष मिले। जरूरी नहीं कि टॉप यूनिवर्सिटी से पढ़ा शख्स ही सफल हो – सफलता की परिभाषा अब बदल रही है।
यह भी एक कटु सच्चाई है कि डिप्रेशन और मानसिक दबाव आज की शिक्षा व्यवस्था में सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बन चुकी है, जिसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।
कभी-कभी ठेले पर बैठा इंसान, क्लासरूम में बैठे ‘टॉपर’ से ज्यादा समझदार होता है।

