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मौत को छूकर लौटे फायरफाइटर की कहानी: 20 टन प्रोपेन ब्लास्ट में ‘क्लिनिकली डेड’ हुए लासे, आज भी देते हैं हौसले की मिसाल

मौत को छूकर लौटे फायरफाइटर की कहानी: 20 टन प्रोपेन ब्लास्ट में ‘क्लिनिकली डेड’ हुए लासे, आज भी देते हैं हौसले की मिसाल

स्वीडन से एक ऐसी कहानी सामने आती है, जिसे सुनकर लोग हैरानी और भावुकता दोनों महसूस करते हैं। 1981 में 20 टन प्रोपेन गैस के भीषण धमाके में गंभीर रूप से घायल हुए फायरफाइटर लासे गुस्टावसन को उस समय चिकित्सकीय रूप से मृत (clinically dead) घोषित कर दिया गया था। लेकिन कुछ समय बाद उन्होंने न सिर्फ जीवन की लड़ाई जीती, बल्कि आज भी अपने अनुभवों को लोगों के लिए प्रेरणा के रूप में साझा करते हैं।

जानकारी के अनुसार, उस भयावह हादसे में लासे का लगभग 40 प्रतिशत शरीर बुरी तरह झुलस गया था। धमाके की तीव्रता इतनी अधिक थी कि वे गंभीर हालत में अस्पताल पहुंचे, जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। हालांकि, बाद में उन्हें पुनर्जीवित किया गया और वे करीब दो महीने तक कोमा में रहे।

इलाज और लंबे संघर्ष के बाद लासे धीरे-धीरे स्वस्थ हुए, लेकिन उनके शरीर पर गहरे जलने के निशान आज भी मौजूद हैं। ये निशान उनके लिए दर्द की याद नहीं, बल्कि जीवित रहने की कहानी का प्रतीक बन गए हैं।

लासे गुस्टावसन का कहना है कि जब वे उस स्थिति में थे, तब उन्हें एक अजीब तरह की शांति और अनुभव महसूस हुआ। उनके अनुसार, उस दौरान उन्हें ऐसा लगा जैसे उन्होंने एक अलग दुनिया को महसूस किया हो। हालांकि, यह उनका व्यक्तिगत अनुभव है और वैज्ञानिक रूप से इसकी कोई पुष्टि नहीं है।

आज 70 वर्ष की उम्र में भी लासे अपने जीवन के इस कठिन दौर को एक प्रेरक कहानी के रूप में देखते हैं। वे अक्सर लोगों को जीवन के प्रति सकारात्मक रहने और मुश्किल परिस्थितियों में हार न मानने का संदेश देते हैं।

वे कहते हैं कि उनके शरीर पर मौजूद जलने के निशान उनके लिए किसी चोट का प्रतीक नहीं, बल्कि “मेडल ऑफ ऑनर” की तरह हैं, जो यह याद दिलाते हैं कि उन्होंने मौत के बेहद करीब जाकर भी जीवन को चुना।

विशेषज्ञों के अनुसार, गंभीर दुर्घटनाओं के बाद जीवित बचे लोगों के अनुभव अक्सर मनोवैज्ञानिक और न्यूरोलॉजिकल प्रभावों से जुड़े होते हैं। ऐसे मामलों में मरीज कोमा या ट्रॉमा के दौरान अलग-अलग तरह की संवेदनाएं महसूस कर सकते हैं।

लासे की कहानी आज भी दुनिया भर में प्रेरणा का स्रोत बनी हुई है और यह बताती है कि मानव इच्छाशक्ति और संघर्ष से असंभव लगने वाली परिस्थितियों को भी पार किया जा सकता है।

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