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इंसानी यूरिन से पिघल रहा हिमालय का ग्लेशियर! रिसर्च में चौंकाने वाला खुलासा, जानिए पूरी कहानी

इंसानी यूरिन से पिघल रहा हिमालय का ग्लेशियर! रिसर्च में चौंकाने वाला खुलासा, जानिए पूरी कहानी

हिमालय के ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने को लेकर एक चौंकाने वाली रिसर्च सामने आई है। वैज्ञानिकों के अध्ययन में पता चला है कि माउंट एवरेस्ट के बेस कैंप पर इंसानी गतिविधियां भी ग्लेशियर के पिघलने की रफ्तार बढ़ा रही हैं। इनमें एक हैरान करने वाला कारण इंसानों का यूरिन (पेशाब) भी बताया गया है। हालांकि, वैज्ञानिकों ने साफ किया है कि ग्लेशियर पिघलने की सबसे बड़ी वजह अभी भी जलवायु परिवर्तन और बढ़ता तापमान है।

रिसर्च के अनुसार, नेपाल स्थित माउंट एवरेस्ट बेस कैंप पर हर साल हजारों पर्वतारोही और सपोर्ट स्टाफ पहुंचते हैं। ऊंचाई वाले इलाके में शरीर को हाइड्रेट रखने के लिए लोग ज्यादा पानी पीते हैं, जिससे यूरिन की मात्रा भी बढ़ जाती है। वैज्ञानिकों के मुताबिक, क्लाइंबिंग सीजन के दौरान यहां रोजाना हजारों लीटर यूरिन निकलता है, जो सीधे ग्लेशियर क्षेत्र में पहुंच जाता है।

अध्ययन में बताया गया कि इंसानी यूरिन शरीर से निकलते समय करीब 37 डिग्री सेल्सियस तापमान पर होता है। जब यह बर्फ और ग्लेशियर के संपर्क में आता है तो अपनी गर्मी आसपास के बर्फीले हिस्से में छोड़ता है। इससे स्थानीय स्तर पर बर्फ पिघलने की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। वैज्ञानिकों ने अनुमान लगाया कि अकेले यूरिन से एक क्लाइंबिंग सीजन में करीब 154 टन तक बर्फ पिघलने में योगदान हो सकता है।

हालांकि, वैज्ञानिकों का कहना है कि यूरिन ग्लेशियर पिघलने का मुख्य कारण नहीं है। बेस कैंप पर इस्तेमाल होने वाले ईंधन, खाना पकाने, गर्म रखने और बिजली उत्पादन से निकलने वाली गर्मी का प्रभाव कहीं ज्यादा है। रिसर्च में पाया गया कि इंसानी गतिविधियों से पैदा होने वाली कुल गर्मी में यूरिन का योगदान एक छोटा हिस्सा है।

शोधकर्ताओं ने 2023 के आंकड़ों का अध्ययन करते हुए बताया कि एवरेस्ट बेस कैंप पर करीब 1600 टेंटों में रहने वाले लोगों की गतिविधियों से बड़ी मात्रा में ऊर्जा और गर्मी पैदा होती है। इसमें एलपीजी, केरोसिन और पेट्रोल जैसे ईंधनों का इस्तेमाल भी शामिल है। इन सभी गतिविधियों के संयुक्त प्रभाव से खुम्बू ग्लेशियर पर असर पड़ रहा है।

वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि एवरेस्ट बेस कैंप जैसे संवेदनशील इलाकों में बढ़ती मानव गतिविधियों को नियंत्रित करने की जरूरत है। उनका कहना है कि ग्लेशियर पहले ही जलवायु परिवर्तन के कारण खतरे में हैं, ऐसे में हजारों लोगों की मौजूदगी स्थानीय स्तर पर समस्या को और बढ़ा सकती है।

हिमालय के ग्लेशियर केवल बर्फ के पहाड़ नहीं हैं, बल्कि एशिया की कई बड़ी नदियों के जल स्रोत हैं। इनके तेजी से पिघलने से भविष्य में पानी की उपलब्धता और पर्यावरण पर गंभीर असर पड़ सकता है। इसलिए विशेषज्ञों ने पर्यटन और पर्वतारोहण गतिविधियों को अधिक पर्यावरण-अनुकूल बनाने पर जोर दिया है।

इस रिसर्च ने यह जरूर दिखाया है कि प्रकृति के बेहद संवेदनशील इलाकों में इंसानी गतिविधियों का छोटा-सा प्रभाव भी लंबे समय में बड़ा असर डाल सकता है।

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