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राजस्थान की वो मशहूर दरगाह जिसके चमत्कार के आगे मक्का वालों के भी छूटते है पसीने

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राजस्थान की पावन धरती पर स्थित अजमेर शरीफ दरगाह न केवल भारत, बल्कि पूरे विश्व में आस्था, विश्वास और चमत्कार का प्रतीक मानी जाती है। यह दरगाह सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की समाधि स्थल है, जिन्हें "गरीब नवाज़" के नाम से भी जाना जाता है। अजमेर शरीफ की दरगाह इतनी चमत्कारी और प्रभावशाली मानी जाती है कि यहां आने वाले श्रद्धालु कहते हैं – "जो मक्का नहीं जा सकते, वो अजमेर शरीफ आ जाएं, ख्वाजा सबकी सुनते हैं।"

यहां हर धर्म, जाति और वर्ग के लोग बिना किसी भेदभाव के सिर झुकाते हैं। कहते हैं कि जो भी सच्चे मन से मुराद मांगता है, उसकी झोली खाली नहीं लौटती। यह चमत्कार ही है कि हर साल लाखों लोग यहां अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए आते हैं – चाहे वे देश के कोने-कोने से हों या विदेशों से। यहां आने वालों में सिर्फ आम लोग ही नहीं, बल्कि बॉलीवुड से लेकर राजनीति तक की बड़ी हस्तियाँ भी शामिल हैं।

चमत्कारों की दरगाह

कई श्रद्धालु कहते हैं कि जब डॉक्टरी इलाज फेल हो जाता है, तब ख्वाजा साहब की दरगाह पर चढ़ी चादर और दुआओं से बीमारी गायब हो जाती है। कुछ लोगों ने यह भी अनुभव किया है कि जब जीवन में हर रास्ता बंद हो जाता है, तो ख्वाजा की चौखट पर रास्ते खुद-ब-खुद खुलने लगते हैं।

दरगाह की सबसे प्रसिद्ध परंपरा है – जियारत और चादर चढ़ाना। श्रद्धालु फूलों की चादर, अत्तर, अगरबत्तियाँ और मिठाई लेकर ख्वाजा साहब के मजार पर चढ़ाते हैं। वहां की फिजा में एक अलग ही सुकून और रूहानियत होती है। ऐसा लगता है जैसे हर दुआ सीधे ऊपर तक पहुंच रही हो।

ख्वाजा साहब का संदेश

ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती ने जीवन भर इंसानियत, मोहब्बत और भाईचारे का संदेश दिया। उनका मानना था कि धर्म का सबसे बड़ा उद्देश्य इंसान की सेवा करना है। उन्होंने कभी किसी से भेदभाव नहीं किया और हर मजहब के लोगों को बराबरी से अपनाया। यही कारण है कि उनकी दरगाह आज भी हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई – सभी धर्मों के लोगों को जोड़ती है।

मक्का वालों की भी आस्था

यह कहावत कि "मक्का वालों के भी छूटते हैं पसीने", इस बात का प्रतीक है कि अजमेर शरीफ दरगाह की आध्यात्मिक शक्ति और चमत्कार इतने प्रभावशाली हैं कि यहां की रूहानी ताकत मक्का जैसे इस्लाम के सबसे पवित्र स्थल से भी तुलना पा जाती है। कई हज से लौटे लोग कहते हैं कि मक्का में जो सुकून मिला, वैसा ही अजमेर में भी महसूस हुआ।

निष्कर्ष

राजस्थान की यह दरगाह न केवल सूफी परंपरा का अद्भुत उदाहरण है, बल्कि यह उस भारत की तस्वीर भी पेश करती है जहां धर्म, आस्था और इंसानियत एक साथ जीते हैं। अजमेर शरीफ सिर्फ एक दरगाह नहीं, बल्कि एक ऐसा आध्यात्मिक केंद्र है जहां से रोशनी, उम्मीद और मोहब्बत निकलती है – हर उस दिल के लिए जो टूटा हुआ है।

ख्वाजा गरीब नवाज की दरगाह पर सिर झुकाते वक्त एक ही दुआ निकलती है – "तेरा दरबार बड़ा पाक है ख्वाजा... जो भी आया, खाली न गया।"

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