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वीडियो में देखिए समय ने कैसे बदल दी इस घर की तस्वीर… कभी था खुशियों का बसेरा

वीडियो में देखिए समय ने कैसे बदल दी इस घर की तस्वीर… कभी था खुशियों का बसेरा

समय से ज्यादा ताकतवर शायद इस दुनिया में कुछ भी नहीं है। इंसान कितना भी कोशिश कर ले, कितनी भी यादों को संभालकर रख ले, लेकिन समय के साथ बहुत कुछ पीछे छूट ही जाता है।जिस वक्त ये घर बना था, तब शायद किसी ने नहीं सोचा होगा कि एक दिन यही घर इतना खाली और शांत खड़ा नजर आएगा।


मेरे पिता गांव से जयपुर यूनिवर्सिटी में दाखिला लेने वाले पहले लड़के थे। पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्हें सरकारी नौकरी मिली और उनकी सबसे पहली इच्छाओं में से एक थी कि गांव में एक अच्छा और मजबूत घर बनाया जाए। उस दौर में जब आसपास के गांवों में इतने बड़े मकान बहुत कम हुआ करते थे, तब हमारा ये घर बनकर तैयार हुआ।

उस समय ये घर आसपास के कई गांवों में चर्चा का विषय बन गया था। आज भी सोशल मीडिया पर जब कभी अपने गांव के लोगों से मुलाकात होती है और इस घर का जिक्र निकलता है, तो वो भी कहते हैं कि हां, ये घर उस समय भी बहुत बड़ी बात हुआ करता था।एक व्यक्ति ने तो यहां तक कहा कि उसे हमेशा लगता था कि ये घर गांव की धर्मशाला है, क्योंकि घर इतना बड़ा था। 

लेकिन किसी घर की असली खूबसूरती उसकी दीवारों या आकार में नहीं होती… उसकी असली खूबसूरती उन लोगों और यादों में होती है, जो उसमें रहते हैं।

इस घर ने हमारे परिवार की न जाने कितनी खुशियां देखी हैं।
कितनी बार इसे दुल्हन की तरह सजाया गया होगा।
कितनी बार यहां मंगल गीत गूंजे होंगे।
कितनी बार रिश्तेदारों से आंगन भरा होगा।
कितनी बार हंसी-मजाक और खुशियों की महफिल सजी होगी।

दादा-दादी यहां रहे। परिवार के बड़े-बुजुर्गों की यादें इस घर के हर कोने से जुड़ी हुई हैं। हम बच्चे गर्मियों की छुट्टियों और त्योहारों में यहां आया करते थे। उस वक्त शायद हमें अंदाजा भी नहीं था कि ये छोटी-छोटी यात्राएं एक दिन जिंदगी की सबसे खूबसूरत यादें बन जाएंगी।

फिर वक्त बदलता गया।

दादा-दादी इस दुनिया से चले गए। परिवार के दूसरे बुजुर्ग भी धीरे-धीरे हमसे दूर होते गए। घर में रहने वाले लोग कम होते गए और जिंदगी अपने-अपने रास्तों पर आगे बढ़ती चली गई।

इस घर में आखिरी बड़ी शादी मेरे छोटे भाई की 2011 में हुई थी। उसके बाद 2024 में जब सबसे छोटे भाई के घर बेटा हुआ, तो एक बार फिर इसी घर में कार्यक्रम रखा गया।

शायद पिताजी के मन में कहीं न कहीं इच्छा थी कि इस घर की पुरानी रौनक एक बार फिर लौटे। हम भाई-बहनों की भी यही इच्छा थी कि बचपन की उन यादों को एक बार फिर महसूस किया जाए।

ये तस्वीरें और वीडियो उसी मौके के हैं।

कुछ पल ऐसे होते हैं जिन्हें कैमरे में कैद करना सिर्फ तस्वीरें लेना नहीं होता… बल्कि वक्त को थोड़ी देर के लिए रोक लेने जैसा होता है।

आज जब इस घर को खाली देखते हैं तो एहसास होता है कि जिंदगी कितनी तेजी से बदलती है। कभी जिस घर में लोगों की आवाजें गूंजती थीं, आज वहां खामोशी है। लेकिन दीवारें आज भी उन आवाजों, उन रिश्तों और उन खुशियों की गवाह हैं।

पिताजी हमेशा एक बात कहते हैं—
“इंसान चाहे जिंदगी में कितना भी सफल क्यों न हो जाए, उसे अपनी जड़ों से हमेशा जुड़ा रहना चाहिए, ताकि उसके पैर जमीन पर टिके रहें।”

शायद यही इस पूरे सफर की सबसे बड़ी सीख है।

क्योंकि हम जहां भी पहुंच जाएं, हमारी शुरुआत कहीं न कहीं उसी मिट्टी से हुई होती है। गांव का घर सिर्फ ईंट-पत्थरों से बना मकान नहीं होता… वो हमारी जड़ों, हमारे बचपन और हमारे परिवार की कहानी होता है।

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