राजस्थान की ‘नाटा’ प्रथा: शादी के बाद भी बनते हैं नए रिश्ते, जानिए इस परंपरा के पीछे का सच?
राजस्थान की संस्कृति और ग्रामीण समाज में कई ऐसी परंपराएं प्रचलित रही हैं, जिनके बारे में जानकर लोग हैरान हो जाते हैं। इन्हीं में से एक है ‘नाता प्रथा’। इस परंपरा के तहत कुछ समुदायों में विवाहित महिला या पुरुष के पहले वैवाहिक संबंध के समाप्त होने अथवा अलग रहने की स्थिति में नए साथी के साथ रहने की सामाजिक व्यवस्था देखने को मिलती है। इसे कई जगह ‘नाता करना’ भी कहा जाता है।
हालांकि, नाता प्रथा को समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि राजस्थान के सभी क्षेत्रों और समुदायों में इसके नियम एक जैसे नहीं हैं। इसकी परंपराएं स्थानीय रीति-रिवाजों, पारिवारिक परिस्थितियों और सामाजिक मान्यताओं के अनुसार अलग-अलग हो सकती हैं।
नाता प्रथा की शुरुआत कैसे हुई?
नाता प्रथा का संबंध ग्रामीण और कुछ आदिवासी समुदायों की सामाजिक परंपराओं से रहा है। पुराने समय में जब तलाक की औपचारिक कानूनी प्रक्रिया तक पहुंचना कठिन था, तब कुछ समुदायों में पति-पत्नी के अलग होने, पति की मृत्यु या वैवाहिक संबंध टूटने के बाद नए साथी के साथ रहने की व्यवस्था अपनाई जाती थी। इसका स्वरूप समुदाय और क्षेत्र के अनुसार अलग-अलग रहा है।
क्या नाता प्रथा में पैसे भी दिए जाते हैं?
कुछ क्षेत्रों में नाता संबंध स्थापित करने के दौरान आर्थिक लेन-देन की परंपरा भी रही है। कुछ मामलों में इसे ‘झगड़ा’ राशि कहा जाता है। यह रकम नए साथी की ओर से महिला के पूर्व पति या परिवार को दिए जाने की बात सामने आई है। हालांकि, यह हर समुदाय में एक जैसा नियम नहीं है।
इस व्यवस्था पर गंभीर सवाल भी उठे हैं। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने जून 2024 में राजस्थान और आसपास के राज्यों में नाता प्रथा के नाम पर लड़कियों की खरीद-फरोख्त और उनकी सहमति की अनदेखी से जुड़े मामलों पर चिंता जताई थी।
महिलाओं के लिए परंपरा या मजबूरी?
नाता प्रथा को लेकर समाज में अलग-अलग विचार हैं। कुछ लोग इसे टूटे हुए वैवाहिक संबंध के बाद दोबारा जीवन शुरू करने का रास्ता मानते हैं। वहीं, सामाजिक शोध में महिलाओं के साथ हिंसा, आर्थिक निर्भरता, सामाजिक पहचान की कमी और बच्चों की जिम्मेदारी जैसी समस्याएं भी सामने आई हैं।
2021 में प्रकाशित एक शोध में राजस्थान की 20 महिलाओं के अनुभवों का अध्ययन किया गया। इसमें कुछ महिलाओं ने असंतुष्ट वैवाहिक जीवन, पति के दुर्व्यवहार, विधवा होने और सामाजिक दबाव को नाता संबंध अपनाने के कारणों के रूप में बताया। शोध ने इस बात पर जोर दिया कि महिला की स्वतंत्र सहमति और अधिकारों की रक्षा बेहद जरूरी है।
नाता प्रथा को लेकर राजस्थान हाईकोर्ट ने क्या कहा?
मई 2026 में राजस्थान हाईकोर्ट ने एक मामले में स्पष्ट किया कि पहली शादी कानूनी रूप से कायम रहते हुए नाता प्रथा के आधार पर दूसरी शादी करना कानून से ऊपर नहीं हो सकता। अदालत ने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के प्रावधानों का हवाला देते हुए कहा कि सामाजिक परंपरा कानून का स्थान नहीं ले सकती। यह मामला पहली पत्नी से तलाक मांगे जाने और दूसरी महिला के साथ नाता संबंध स्थापित करने से जुड़ा था।
इसका अर्थ है कि किसी परंपरा का सामाजिक रूप से प्रचलित होना उसे अपने आप कानूनी मान्यता नहीं देता। विवाह, तलाक और दूसरे विवाह की वैधता संबंधित कानून और मामले की परिस्थितियों के आधार पर तय होती है।
आखिर क्या है नाता प्रथा का असली सच?
राजस्थान की नाता प्रथा को केवल एक अनोखी परंपरा या शादी के बाद नए रिश्ते बनाने की व्यवस्था कहकर समझना अधूरा होगा। इसके पीछे सामाजिक इतिहास, ग्रामीण जीवन की परिस्थितियां और वैवाहिक संबंधों से जुड़ी जटिलताएं हैं। कुछ परिस्थितियों में यह नए जीवन की शुरुआत का माध्यम रही है, जबकि कुछ मामलों में इसके नाम पर महिलाओं के अधिकारों का हनन भी हुआ है।

