रेलवे का 'मधुमक्खी' प्लान बचाएगा हाथियों की जान, ट्रैक से कटकर जाती हैं हजारों जानें
रेलवे देश की जीवन रेखा है, लेकिन इसके पटरियों पर अक्सर जंगली जानवरों, खासकर हाथियों की जान को खतरा बना रहता है। हर साल देश के अलग-अलग हिस्सों में ट्रेन और हाथियों की टक्कर की कई घटनाएं सामने आती हैं, जिनमें कई बार हाथियों की मौत भी हो जाती है। इस गंभीर समस्या से निपटने के लिए भारतीय रेलवे ने एक अनूठा और अनोखा तरीका खोज निकाला है, जिसे ‘Plan Bee’ के नाम से जाना जाता है।
क्या है ‘Plan Bee’?
‘Plan Bee’ भारतीय रेलवे की एक विशेष योजना है, जिसके तहत रेल पटरियों के आसपास मधुमक्खियों की आवाज़ उत्पन्न करने वाले ध्वनि यंत्र लगाए गए हैं। इन यंत्रों से ऐसी ध्वनि निकलती है जो हूबहू मधुमक्खियों की आवाज़ जैसी होती है। वैज्ञानिकों और वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार, हाथी मधुमक्खियों की आवाज से स्वाभाविक रूप से डरते हैं, क्योंकि उनके शरीर का कुछ हिस्सा संवेदनशील होता है और मधुमक्खियों के डंक उन्हें काफी तकलीफ देते हैं।
इसी डर का फायदा उठाते हुए रेलवे ने यह योजना बनाई कि जैसे ही ट्रेन किसी जंगली क्षेत्र या हाथियों के विचरण वाले इलाके से गुज़रे, इन यंत्रों को सक्रिय कर दिया जाए। ध्वनि यंत्र की मधुमक्खी जैसी आवाज सुनकर हाथी रेलवे ट्रैक से दूर हो जाते हैं, जिससे ट्रेन और हाथियों की टक्कर की आशंका काफी हद तक कम हो जाती है।
क्यों पड़ी इसकी जरूरत?
रेलवे ट्रैक पर हाथियों की मौत कोई नई बात नहीं है। खासकर असम, पश्चिम बंगाल, ओडिशा और झारखंड जैसे राज्यों में, जो हाथियों के प्राकृतिक आवास हैं, वहां यह समस्या और भी गंभीर है।
एक रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2014 से 2016 के बीच में ही 35 से ज्यादा हाथियों की मौत ट्रेन से टकराने की वजह से हुई। यह न केवल एक प्राकृतिक और पर्यावरणीय क्षति है, बल्कि रेलवे के लिए भी एक बड़ी चुनौती है। हाथी की मौत के बाद ट्रेनों की आवाजाही में बाधा आती है, ट्रैक की मरम्मत करनी पड़ती है और कई बार यात्रियों की सुरक्षा भी खतरे में पड़ जाती है।
कैसे काम करता है ये सिस्टम?
‘Plan Bee’ के तहत रेलवे ने उत्तर-पूर्वी सीमांत रेलवे (North East Frontier Railway) के ज़रिए कई ऐसे ट्रैक प्वाइंट्स को चिन्हित किया है, जहां अक्सर हाथियों की आवाजाही होती है। यहां पर विशेष ध्वनि यंत्र (sound devices) लगाए गए हैं, जो बटन दबाते ही मधुमक्खियों की आवाज निकालते हैं। ट्रेन के ड्राइवर या स्टेशन मास्टर जब किसी इलाके में हाथियों की उपस्थिति की सूचना पाते हैं, तो ये यंत्र सक्रिय कर दिए जाते हैं।
यह प्रणाली इतनी प्रभावशाली साबित हुई है कि अब तक कई जगहों पर हाथियों की जान बचाई जा चुकी है, और ट्रेन दुर्घटनाएं टल गई हैं।
‘Plan Bee’ को मिली अंतरराष्ट्रीय पहचान
भारतीय रेलवे की यह पहल न सिर्फ देश में बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सराही गई है। यह एक ऐसा उदाहरण है जो दर्शाता है कि किस तरह पर्यावरण और प्रौद्योगिकी का संतुलन बनाकर जानवरों की रक्षा की जा सकती है। रेलवे ने इसे और प्रभावशाली बनाने के लिए भविष्य में और भी तकनीकी सुधारों की योजना बनाई है।
निष्कर्ष
भारतीय रेलवे का ‘Plan Bee’ यह साबित करता है कि यदि सही सोच और संवेदनशीलता के साथ कदम उठाया जाए, तो प्रकृति और विकास दोनों को एक साथ बचाया जा सकता है। यह योजना केवल हाथियों की जान बचाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक संदेश भी देती है कि विकास के रास्ते पर चलते हुए पर्यावरण और वन्यजीव संरक्षण को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
ऐसी अनूठी योजनाएं आने वाले समय में और भी जरूरी हो जाएंगी, जब हमें प्रकृति और तकनीक के बीच संतुलन बनाकर आगे बढ़ना होगा। ‘Plan Bee’ एक छोटी सी आवाज़ है, लेकिन इसका असर बहुत बड़ा है – न केवल रेलवे के लिए, बल्कि पूरे देश की पर्यावरणीय चेतना के लिए।

