सड़क पर विपक्ष: कितने असल मुद्दे हैं कांग्रेस के पास? आखिर क्यों निशाने पर है चुनाव आयोग?
देश की राजनीति में इन दिनों कांग्रेस और विपक्षी गठबंधन INDIA के प्रदर्शन चर्चा में हैं। चुनाव आयोग के खिलाफ विरोध, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर विपक्ष लगातार सवाल उठा रहा है। 12 अक्टूबर 2026 को विपक्षी नेताओं ने सुप्रीम कोर्ट की ओर मार्च किया और मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों की जांच की मांग को लेकर याचिका भी दायर की। ऐसे में सवाल है कि कांग्रेस किन मुद्दों को लेकर सड़क पर है और चुनाव आयोग पर उसके हमलों की वजह क्या है?
SIR बना राजनीतिक टकराव का केंद्र
विवाद का सबसे बड़ा मुद्दा मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण है। चुनाव आयोग का कहना है कि इस प्रक्रिया का उद्देश्य मतदाता सूची को दुरुस्त करना और मृत, स्थानांतरित, दोहरी या अपात्र प्रविष्टियों को हटाना है। दूसरी ओर, कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों का आरोप है कि इस प्रक्रिया में बड़ी संख्या में पात्र मतदाताओं के नाम भी सूची से हटने का खतरा है।
विपक्ष की प्रमुख चिंता गरीबों, प्रवासी मजदूरों, बुजुर्गों और उन लोगों को लेकर है, जिनके पास पुराने दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं। विपक्ष चाहता है कि मतदाता सूची में नाम हटाने और जोड़ने की प्रक्रिया पारदर्शी हो तथा प्रभावित लोगों को अपनी पात्रता साबित करने और नाम दोबारा जुड़वाने का पर्याप्त अवसर मिले। हालांकि, नाम हटाए जाने के आंकड़ों और उनके कारणों को लेकर चुनाव आयोग और आलोचकों के दावों में अंतर है।की 13 अक्टूबर की रिपोर्ट के अनुसार, आयोग हटाए गए नामों को मृत, स्थानांतरित, दोहरी या अन्य कारणों से अपात्र प्रविष्टियों से जोड़ता है, जबकि आलोचक प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठा रहे हैं।
चुनाव आयोग ही निशाने पर क्यों?
कांग्रेस का तर्क है कि निष्पक्ष चुनाव के लिए मतदाता सूची की विश्वसनीयता और चुनाव आयोग की स्वतंत्रता बेहद जरूरी है। पार्टी के नेताओं ने आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की है। विपक्ष ने SIR से जुड़े फैसलों, आयोग की आंतरिक प्रक्रियाओं और मतदाता सूची में बदलाव के रिकॉर्ड की जांच कराने की मांग भी उठाई है।
विवाद को तब और हवा मिली, जब मीडिया रिपोर्टों में चुनाव आयोग के दो अन्य आयुक्तों की ओर से कुछ फैसलों और प्रक्रियाओं पर दर्ज आपत्तियों की जानकारी सामने आई। विपक्ष इसे पारदर्शिता से जुड़ा सवाल बता रहा है। हालांकि, आयोग की ओर से यह भी कहा गया है कि आंतरिक विचार-विमर्श में मतभेद होना अपने आप में असामान्य नहीं है।
कांग्रेस के पास कौन-कौन से मुद्दे हैं?
कांग्रेस के आंदोलन को केवल चुनाव आयोग के खिलाफ प्रदर्शन तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। पार्टी इसे लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वतंत्रता, मताधिकार की सुरक्षा, चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता और विपक्ष की आवाज सुने जाने जैसे व्यापक मुद्दों से जोड़ रही है। राहुल गांधी और अन्य विपक्षी नेताओं ने कथित ‘वोट चोरी’ के आरोपों की जांच कराने तथा चुनाव प्रक्रिया पर उठे सवालों का जवाब देने की मांग की है।
12 अक्टूबर को INDIA ब्लॉक के कई नेताओं ने सुप्रीम कोर्ट की ओर मार्च किया। उनकी मांगों में SIR प्रक्रिया से जुड़ी अनियमितताओं की जांच, संबंधित रिकॉर्ड सार्वजनिक करना और चुनाव आयोग के फैसलों की समीक्षा शामिल थी। अब यह विवाद राजनीतिक मंच से आगे बढ़कर कानूनी बहस का हिस्सा भी बन गया है।
भाजपा का जवाब: संस्थाओं पर सवाल उठाना उचित नहीं
भाजपा और केंद्र सरकार के नेताओं ने विपक्ष के आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था पर राजनीतिक आरोप लगाना उचित नहीं है। भाजपा नेताओं का तर्क है कि चुनावी हार के बाद संस्थाओं पर सवाल उठाने के बजाय विपक्ष को अपनी राजनीतिक रणनीति पर विचार करना चाहिए। इस तरह दोनों पक्षों के बीच विवाद केवल SIR तक सीमित नहीं रहा, बल्कि चुनावी संस्थाओं की निष्पक्षता और राजनीतिक जवाबदेही पर भी केंद्रित हो गया है।
असल सवाल का जवाब क्या है?
कांग्रेस के पास मतदाता सूची, पारदर्शिता, मताधिकार और संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता जैसे मुद्दे हैं। लेकिन इन मुद्दों पर राजनीतिक आरोपों से आगे बढ़कर ठोस प्रमाण, प्रभावित मतदाताओं का सत्यापन और स्पष्ट समाधान पेश करना भी जरूरी है। वहीं, चुनाव आयोग के लिए भी यह महत्वपूर्ण है कि नाम हटाने के कारण, आपत्ति दर्ज कराने की प्रक्रिया और सुधार के उपाय स्पष्ट रूप से जनता के सामने रखे जाएं।आखिरकार, इस विवाद का फैसला केवल राजनीतिक नारों से नहीं होगा। असली कसौटी यह होगी कि पात्र मतदाताओं का अधिकार सुरक्षित रहे, गलत प्रविष्टियां सुधारी जाएं और चुनाव प्रक्रिया पर जनता का भरोसा बना रहे।

