आंख फड़कने को समझा अपशगुन, शख्स ने खुद को मारी थप्पड़; अंधविश्वास में गंवाई आंखों की रोशनी
चीन के वुहान से एक हैरान करने वाला मामला सामने आया है, जहां एक शख्स ने आंख फड़कने को अपशगुन समझकर ऐसा कदम उठा लिया, जिससे उसकी आंखों की रोशनी तक चली गई। अंधविश्वास के चलते उसने अपनी ही आंख पर लगातार थप्पड़ मारे, जिसके कारण उसकी रेटिना खिसक गई। हालांकि, समय पर इलाज मिलने से डॉक्टरों ने सर्जरी के जरिए उसकी आंख बचा ली।
दाईं आंख फड़कने से डर गया था शख्स
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, वुहान निवासी ले नाम के एक व्यक्ति की दाईं आंख लगातार फड़क रही थी। कई जगहों पर आंख फड़कने को लेकर तरह-तरह की मान्यताएं और अंधविश्वास प्रचलित हैं। इसी डर के चलते ले को लगा कि यह किसी अनहोनी का संकेत है।
इस डर में उसने अपनी आंख की फड़कन रोकने के लिए खुद ही अजीब तरीका अपनाया। उसने लगातार तीन दिनों तक अपनी दाईं आंख पर थप्पड़ मारे। उसे लगा कि ऐसा करने से आंख फड़कना बंद हो जाएगा, लेकिन इसका गंभीर नुकसान हुआ।
रेटिना खिसकने से चली गई रोशनी
लगातार आंख पर चोट लगने के कारण उसकी आंख के अंदर मौजूद रेटिना प्रभावित हो गई और वह अपनी जगह से खिसक गई। रेटिना के क्षतिग्रस्त होने की वजह से ले की आंखों की रोशनी कमजोर हो गई और उसे दिखाई देना बंद हो गया।
इसके बाद जब वह डॉक्टर के पास पहुंचा तो जांच में पता चला कि आंख में गंभीर चोट आई है। डॉक्टरों ने तुरंत इलाज शुरू किया और सर्जरी के बाद उसकी आंख को बचाने में सफलता मिली।
डॉक्टरों ने बताया असली कारण
चिकित्सकों के अनुसार, आंख फड़कना कोई अपशगुन या भविष्य में होने वाली घटना का संकेत नहीं होता। आमतौर पर आंखों की मांसपेशियों में हलचल कई सामान्य कारणों से हो सकती है।
डॉक्टर बताते हैं कि तनाव, थकान, नींद की कमी, ज्यादा स्क्रीन टाइम, कैफीन का अधिक सेवन या आंखों पर ज्यादा दबाव पड़ने से आंख फड़क सकती है। यह एक सामान्य समस्या है, जो अक्सर कुछ समय बाद अपने आप ठीक हो जाती है।
अंधविश्वास से बचने की जरूरत
इस घटना ने एक बार फिर दिखाया है कि अंधविश्वास और गलत धारणाएं कई बार गंभीर नुकसान पहुंचा सकती हैं। स्वास्थ्य संबंधी किसी भी समस्या के लिए खुद से इलाज करने के बजाय विशेषज्ञ डॉक्टर की सलाह लेना जरूरी है।
आंख शरीर का बेहद संवेदनशील अंग है और इस पर किसी भी तरह की चोट गंभीर परिणाम दे सकती है। विशेषज्ञों की सलाह है कि किसी भी शारीरिक लक्षण को अपशगुन मानने के बजाय उसके वैज्ञानिक कारणों को समझना चाहिए और जरूरत पड़ने पर चिकित्सकीय मदद लेनी चाहिए।

