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भारत का 'साइलेंट विलेज': जहां 2,000 की आबादी में 90 से ज्यादा लोग हैं मूक-बधिर, वैज्ञानिकों ने बताई चौंकाने वाली वजह

भारत का 'साइलेंट विलेज': जहां 2,000 की आबादी में 90 से ज्यादा लोग हैं मूक-बधिर, वैज्ञानिकों ने बताई चौंकाने वाली वजह

जम्मू-कश्मीर के डोडा जिले का धदकई गांव अपनी प्राकृतिक खूबसूरती के साथ-साथ एक अनोखी और चिंताजनक वजह से भी चर्चा में रहता है। इस गांव को 'द साइलेंट विलेज ऑफ इंडिया' कहा जाता है, क्योंकि यहां रहने वाले लोगों में असामान्य रूप से बड़ी संख्या मूक-बधिर है। करीब 2,000 की आबादी वाले इस गांव में 90 से अधिक लोग सुनने और बोलने में अमर्थ हैं। वर्षों से यह स्थिति वैज्ञानिकों और चिकित्सा विशेषज्ञों के लिए भी शोध का विषय बनी हुई है।

क्या है इस समस्या की वजह?

वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों के अनुसार, धदकई गांव में मूक-बधिरता का मुख्य कारण OTOF जीन में पाया गया जेनेटिक दोष है। यह जीन सुनने की क्षमता से जुड़ा होता है। जब इसमें गड़बड़ी होती है तो जन्मजात श्रवण क्षमता प्रभावित हो सकती है, जिससे व्यक्ति सुन और बोल नहीं पाता।

करीबी रिश्तेदारों में शादी बनी बड़ी वजह

विशेषज्ञों का कहना है कि इस गांव में लंबे समय से करीबी रिश्तेदारों के बीच विवाह (Consanguineous Marriage) की परंपरा रही है। ऐसे विवाहों में एक ही परिवार या वंश के समान आनुवंशिक दोष अगली पीढ़ी तक पहुंचने की संभावना बढ़ जाती है। इसी कारण OTOF जीन में मौजूद दोष पीढ़ी-दर-पीढ़ी फैलता गया और मूक-बधिर बच्चों के जन्म के मामलों में वृद्धि हुई।

जेनेटिक जांच में हुआ खुलासा

शोधकर्ताओं द्वारा किए गए आनुवंशिक अध्ययन में पाया गया कि गांव के कई प्रभावित लोगों में OTOF जीन में समान प्रकार का म्यूटेशन मौजूद है। इससे यह स्पष्ट हुआ कि यह समस्या किसी संक्रमण या पर्यावरणीय कारण से नहीं, बल्कि मुख्य रूप से आनुवंशिक कारणों से जुड़ी हुई है।

जागरूकता और जांच की जरूरत

विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी स्थिति से बचने के लिए जेनेटिक काउंसलिंग, समय पर नवजात शिशुओं की श्रवण जांच और लोगों में जागरूकता बढ़ाना बेहद जरूरी है। यदि परिवारों को पहले से आनुवंशिक जोखिम की जानकारी हो, तो भविष्य में इस तरह के मामलों को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

देश-दुनिया में बना शोध का विषय

धदकई गांव आज चिकित्सा विज्ञान और आनुवंशिकी के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण अध्ययन का केंद्र बन चुका है। यहां की स्थिति इस बात का उदाहरण है कि आनुवंशिक बीमारियों की रोकथाम के लिए समय पर जांच, वैज्ञानिक सलाह और सामाजिक जागरूकता कितनी आवश्यक है।

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