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गांव जहां सिर्फ एक महिला रहती है, बेटा बोल नहीं पाता; वीरान बस्ती में मां-बेटे की जिंदगी

गांव जहां सिर्फ एक महिला रहती है, बेटा बोल नहीं पाता; वीरान बस्ती में मां-बेटे की जिंदगी

भारत के कई हिस्सों में ऐसे गांव भी हैं, जहां कभी लोगों की चहल-पहल हुआ करती थी, लेकिन धीरे-धीरे रोजगार, बेहतर शिक्षा और सुविधाओं की तलाश में लोग शहरों की ओर पलायन कर गए। आज इन गांवों में गिने-चुने परिवार ही बचे हैं। ऐसा ही एक गांव इन दिनों चर्चा में है, जहां अब सिर्फ एक महिला अपने बेटे के साथ रहती है। गांव की वीरान गलियों और खाली पड़े मकानों के बीच मां-बेटे की जिंदगी बेहद मुश्किल हालात में गुजर रही है।

गांव में कभी कई परिवार रहते थे। घरों में बच्चों की आवाजें सुनाई देती थीं और खेतों में लोगों की मौजूदगी रहती थी। समय के साथ गांव के अधिकांश लोग बेहतर भविष्य की तलाश में दूसरी जगह चले गए। कुछ परिवार रोजगार के लिए शहरों में बस गए तो कुछ ने अपने बच्चों की पढ़ाई के लिए गांव छोड़ दिया। देखते ही देखते पूरी बस्ती सुनसान होती चली गई।

अब इस गांव में केवल एक महिला अपने बेटे के साथ रह रही है। आसपास बने कई मकान खाली पड़े हैं। कहीं दरवाजे टूट चुके हैं तो कहीं घरों की दीवारों पर समय और मौसम के निशान साफ दिखाई देते हैं। कभी आबाद रहा यह गांव अब वीरानी की कहानी बयां करता है।

महिला की जिंदगी की सबसे बड़ी चुनौती उसका बेटा भी है, जो बोल नहीं पाता। ऐसे में मां ही उसके लिए सहारा है। बेटे की जरूरतों को समझना, उसकी देखभाल करना और रोजमर्रा के काम संभालना महिला की जिम्मेदारी है। गांव में लोगों की गैरमौजूदगी के कारण किसी भी परेशानी की स्थिति में तत्काल मदद मिलना भी आसान नहीं है।

वीरान गांव में रहने के बावजूद महिला ने अपनी जिंदगी को संभाल रखा है। वह अपने बेटे के साथ यहीं रहकर जीवन गुजार रही है। सीमित संसाधनों के बीच मां-बेटे की दिनचर्या चलती है। गांव में पहले मौजूद सामुदायिक जीवन की जगह अब खामोशी ने ले ली है।

इस कहानी का एक बड़ा पहलू ग्रामीण इलाकों से लगातार हो रहा पलायन भी है। रोजगार और सुविधाओं की कमी के कारण बड़ी संख्या में ग्रामीण परिवार शहरों की ओर जाते हैं। युवा पीढ़ी गांव छोड़ देती है और पीछे बुजुर्ग, महिलाएं या वे लोग रह जाते हैं, जिनके लिए स्थान बदलना आसान नहीं होता।

ऐसे गांव केवल खाली मकानों की कहानी नहीं बताते, बल्कि बदलते ग्रामीण भारत की तस्वीर भी सामने रखते हैं। कभी जिन गलियों में लोगों की आवाजाही रहती थी, वहां अब सन्नाटा पसरा है। खेत और घर मौजूद हैं, लेकिन उन्हें आबाद रखने वाले लोग धीरे-धीरे कम होते जा रहे हैं।

एक महिला और उसके बोल न पाने वाले बेटे की यह जिंदगी उस सामाजिक बदलाव की ओर भी ध्यान खींचती है, जिसमें गांवों की आबादी लगातार घट रही है। सवाल यह है कि आने वाले वर्षों में ऐसे गांवों का क्या होगा और क्या कभी इन वीरान बस्तियों में फिर से लोगों की आवाजाही लौट पाएगी।

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