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‘टिकट लिया है तो सब हमारा है?’ रेलवे की संपत्ति ले जाते पकड़े गए लोग, VIDEO हुआ वायरल

‘टिकट लिया है तो सब हमारा है?’ रेलवे की संपत्ति ले जाते पकड़े गए लोग, VIDEO हुआ वायरल

एक तरफ रेलवे यात्रियों को बेहतर सुविधाएं देने की कोशिश करता है, वहीं कुछ लोग ऐसी हरकत कर देते हैं, जिसे देखकर सवाल उठता है कि आखिर सार्वजनिक संपत्ति को लेकर लोगों की जिम्मेदारी कब तय होगी?सोशल मीडिया पर एक ऐसा मामला चर्चा में है, जिसमें कुछ यात्रियों पर ट्रेन के AC कोच की सीट/सामान को कथित तौर पर चोरी करके घर ले जाने का आरोप लगा। बताया जा रहा है कि यात्रियों ने AC का टिकट लिया था, लेकिन शायद उन्हें लगा कि टिकट खरीदने के साथ ट्रेन के अंदर रखा सामान भी उनका हो गया है।


आरोप है कि ट्रेन में सफर के दौरान रेलवे की संपत्ति को निकालकर अपने साथ ले जाने की कोशिश की गई। लेकिन जब यह मामला पकड़ में आया तो कथित तौर पर अपनी गलती स्वीकार करने के बजाय बहस और अकड़ दिखाने की बात सामने आई।

टिकट खरीदा है, रेलवे का सामान नहीं

AC कोच का टिकट खरीदने का मतलब सिर्फ ट्रेन में तय सीट पर यात्रा करने का अधिकार है। ट्रेन की सीट, पर्दे, चादर, तकिया या कोच में लगा कोई भी सामान रेलवे की संपत्ति होता है।

यात्रियों को इन सुविधाओं का इस्तेमाल करने का अधिकार है, लेकिन उन्हें अपने साथ घर ले जाने का अधिकार नहीं।

अगर कोई यात्री रेलवे की संपत्ति को जानबूझकर नुकसान पहुंचाता है या उसे अपने साथ ले जाने की कोशिश करता है, तो यह सिर्फ ‘छोटी सी शरारत’ नहीं मानी जा सकती। इससे रेलवे को आर्थिक नुकसान होता है और दूसरे यात्रियों के लिए भी सुविधाएं प्रभावित होती हैं।

रेलवे हर चीज पर नजर कैसे रखे?

इस घटना के बाद एक बड़ा सवाल यह भी है कि रेलवे आखिर हर यात्री पर कितनी निगरानी रख सकता है?

लाखों लोग रोजाना ट्रेनों में सफर करते हैं। हर सीट, हर कोच और हर सामान पर लगातार नजर रखना आसान नहीं है। रेलवे अपनी तरफ से सुरक्षा और निगरानी की व्यवस्था करता है, लेकिन सार्वजनिक संपत्ति की जिम्मेदारी यात्रियों की भी होती है।

ट्रेन में लगी कोई चीज पसंद आ गई तो उसे घर ले जाना या नुकसान पहुंचाना किसी भी तरह सही नहीं ठहराया जा सकता।

सुविधा हमारी है तो जिम्मेदारी भी हमारी है

ट्रेन में साफ-सफाई हो, सीट अच्छी स्थिति में हो, चादर और तकिया मिले या AC कोच की दूसरी सुविधाएं—इनका इस्तेमाल करने के साथ उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी भी यात्रियों की है।

अगर हर यात्री यह सोचने लगे कि ‘मैंने टिकट खरीदा है, इसलिए ट्रेन में जो चाहूं कर सकता हूं’, तो सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था को नुकसान पहुंचना तय है।

रेलवे की संपत्ति आखिर जनता के पैसे से ही तैयार होती है। इसलिए उसे नुकसान पहुंचाना या चोरी करना अप्रत्यक्ष रूप से सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाना है।

टिकट खरीदना यात्रा का अधिकार देता है, रेलवे का सामान घर ले जाने का नहीं। सुविधाएं रेलवे की हों या किसी भी सार्वजनिक संस्था की—उनका इस्तेमाल करना हमारा अधिकार है, लेकिन उनकी सुरक्षा करना हमारी जिम्मेदारी भी है।

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