कुत्ते सूंघकर कैंसर का पता लगाएंगे, वैज्ञानिकों की रिसर्च से बढ़ी उम्मीद; जानिए कैसे काम करती है तकनीक
कुत्तों की सूंघने की क्षमता इंसानों की तुलना में कई गुना अधिक होती है। इसी खासियत का इस्तेमाल अब वैज्ञानिक कैंसर जैसी गंभीर बीमारी की पहचान के लिए करने की दिशा में कर रहे हैं। रिसर्च में यह जांच की जा रही है कि प्रशिक्षित कुत्ते शरीर से निकलने वाली विशेष गंध के जरिए कैंसर से जुड़े रासायनिक संकेतों को पहचान सकते हैं या नहीं।
दरअसल, कैंसर होने पर शरीर में कुछ जैविक और रासायनिक बदलाव होते हैं। इन बदलावों की वजह से सांस, पसीने, मूत्र या शरीर के दूसरे नमूनों में वाष्पशील कार्बनिक यौगिक यानी VOCs बदल सकते हैं। इंसानी नाक इन बेहद सूक्ष्म गंधों को पहचान नहीं सकती, लेकिन कुत्तों की सूंघने की क्षमता काफी संवेदनशील होती है। इसी कारण वैज्ञानिक उन्हें विशेष गंध पहचानने के लिए प्रशिक्षित करने पर काम कर रहे हैं।
रिसर्च के दौरान प्रशिक्षित कुत्तों को अलग-अलग नमूनों की गंध पहचानने की ट्रेनिंग दी जाती है। इनमें स्वस्थ व्यक्ति के नमूने और कैंसर से जुड़े नमूने शामिल हो सकते हैं। कुत्ते किसी विशेष गंध को पहचानने पर संकेत देते हैं। वैज्ञानिक इसके बाद यह जांचते हैं कि उनकी पहचान कितनी सटीक है और क्या इस तरीके को भविष्य में मेडिकल स्क्रीनिंग के सहायक साधन के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।
इस तकनीक का एक संभावित फायदा यह है कि शरीर से लिए गए नमूनों के जरिए बीमारी की शुरुआती पहचान के लिए एक गैर-आक्रामक तरीका विकसित किया जा सकता है। यदि वैज्ञानिक इस प्रक्रिया को पर्याप्त रूप से विश्वसनीय बनाने में सफल होते हैं, तो भविष्य में इसका इस्तेमाल शुरुआती जांच से जुड़ी तकनीकों के विकास में मदद कर सकता है।
हालांकि, यह समझना जरूरी है कि प्रशिक्षित कुत्तों द्वारा कैंसर की गंध पहचानने से जुड़ी रिसर्च अभी मेडिकल जांच का विकल्प नहीं है। किसी व्यक्ति को कैंसर है या नहीं, यह तय करने के लिए डॉक्टर आवश्यक जांच और परीक्षण कराते हैं। केवल कुत्ते की प्रतिक्रिया के आधार पर बीमारी का निदान नहीं किया जा सकता।
वैज्ञानिकों के सामने कई चुनौतियां भी हैं। अलग-अलग प्रकार के कैंसर में रासायनिक संकेत अलग हो सकते हैं। इसके अलावा व्यक्ति का खान-पान, दवाएं, उम्र और अन्य स्वास्थ्य स्थितियां भी शरीर की गंध को प्रभावित कर सकती हैं। इसलिए इस तकनीक को बड़े स्तर पर इस्तेमाल करने से पहले इसकी सटीकता और विश्वसनीयता पर व्यापक अध्ययन जरूरी है।
फिर भी, कुत्तों की सूंघने की क्षमता का चिकित्सा अनुसंधान में इस्तेमाल एक दिलचस्प क्षेत्र बन चुका है। कैंसर से जुड़े विशेष रासायनिक संकेतों को पहचानने की उनकी क्षमता वैज्ञानिकों को ऐसे बायोमार्कर खोजने में भी मदद कर सकती है, जिन्हें भविष्य में मशीन या सेंसर आधारित तकनीक के जरिए पहचाना जा सके।
इस तरह ‘कुत्ते सूंघकर कैंसर का पता लगाएंगे’ कहना फिलहाल रिसर्च की दिशा को बताता है, न कि यह कि हर कुत्ता कैंसर का भरोसेमंद निदान कर सकता है। वैज्ञानिकों के प्रयोगों से भविष्य में शुरुआती जांच के नए तरीके विकसित होने की उम्मीद जरूर बनी हुई है।

