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क्या मयूर विहार का 'मोर' से सचमुच कनेक्शन है? दिल्ली के पॉश इलाके के नाम का ये सीक्रेट नहीं जानते होंगे आप

क्या मयूर विहार का 'मोर' से सचमुच कनेक्शन है? दिल्ली के पॉश इलाके के नाम का ये सीक्रेट नहीं जानते होंगे आप

दिल्ली के कई इलाकों के नाम अपने अंदर इतिहास और रहस्यों की कहानियां छिपाए हुए हैं। इन्हीं में से एक है पूर्वी दिल्ली का चर्चित रिहायशी इलाका मयूर विहार। नाम सुनते ही सबसे पहला सवाल आता है कि क्या इस जगह का संबंध सच में मोरों (Peacock) से है या फिर यह सिर्फ एक नाम है?

कभी हरियाली और मोरों के लिए जाना जाता था इलाका

आज जहां मयूर विहार में ऊंची इमारतें, बाजार और मेट्रो दिखाई देते हैं, वहां कुछ दशक पहले तक काफी खुला क्षेत्र और हरियाली थी। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, यमुना के आसपास के इस इलाके में कभी बड़ी संख्या में मोर दिखाई देते थे। इसी प्राकृतिक माहौल को देखते हुए इलाके का नाम 'मयूर विहार' रखा गया, जिसका अर्थ होता है- मोरों का निवास या विचरण स्थल

DDA की योजना से बना आधुनिक इलाका

मयूर विहार का विकास दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) की आवासीय योजना के तहत हुआ। 1970-80 के दशक में ट्रांस-यमुना इलाके में तेजी से रिहायशी कॉलोनियां विकसित की गईं। इसके बाद मयूर विहार फेज-1, फेज-2 और फेज-3 के रूप में यह इलाका दिल्ली के प्रमुख आवासीय क्षेत्रों में शामिल हो गया।

क्या सच में यहां मोर रहते थे?

मयूर विहार के नाम को मोरों से जोड़ने वाली कहानी काफी लोकप्रिय है, लेकिन इसके पीछे कोई ऐसा स्पष्ट सरकारी दस्तावेज उपलब्ध नहीं है जो यह साबित करे कि केवल मोरों की मौजूदगी के कारण ही नाम रखा गया था। इसे स्थानीय इतिहास और प्रचलित मान्यता के तौर पर देखा जाता है।

आज भी नाम में जिंदा है पुरानी पहचान

समय के साथ इस इलाके का स्वरूप पूरी तरह बदल गया। कंक्रीट की इमारतों और बढ़ती आबादी ने पुराने प्राकृतिक माहौल को काफी हद तक बदल दिया, लेकिन 'मयूर विहार' नाम आज भी उस दौर की याद दिलाता है जब यह क्षेत्र ज्यादा हरियाली और खुले स्थानों के लिए जाना जाता था।

यानी मयूर विहार का 'मोर कनेक्शन' पूरी तरह साबित इतिहास भले न हो, लेकिन इस नाम के पीछे छिपी कहानी दिल्ली के शहरी विकास और प्रकृति के पुराने रिश्ते की दिलचस्प झलक जरूर देती है।

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