5 दिन के नवजात का ब्लड ग्रुप अचानक बदला? पहले A+ फिर B+… इंदौर का अजब-गजब केस
मध्य प्रदेश की कमर्शियल राजधानी इंदौर में हेल्थकेयर सिस्टम और प्राइवेट पैथोलॉजी लैब के कामकाज पर गंभीर सवाल उठाने वाली एक घटना सामने आई है। दो अलग-अलग लैब ने पांच दिन के बच्चे के ब्लड ग्रुप के बारे में अलग-अलग रिपोर्ट जारी कीं। एक जानी-मानी डायग्नोस्टिक लैब ने बच्चे का ब्लड ग्रुप 'A+' (A-पॉज़िटिव) बताया, जबकि दूसरी लैब की जांच में यह 'B+' (B-पॉज़िटिव) निकला।
जब बच्चे के पिता ने इस खतरनाक गलती के बारे में पहली लैब से सफाई मांगी, तो मैनेजमेंट का रवैया बहुत गैर-जिम्मेदाराना था; उन्होंने मामले को सिर्फ़ "प्रिंटिंग की गलती" कहकर टाल दिया और बस एक सही रिपोर्ट दे दी।
शिकायत करने वाले राजपूत के अनुसार, उन्होंने ढक्कनवाला कुआं स्थित 'नीरज डायग्नोस्टिक्स लैब' में अपने पांच दिन के बच्चे का ब्लड टेस्ट करवाया था। सैंपल देने के कुछ ही देर बाद, उन्हें लैब से फोन आया कि पहला सैंपल सही नहीं था और एक नया सैंपल चाहिए। इसके बाद, एक लैब टेक्नीशियन उनके घर आया और नवजात शिशु का दूसरा ब्लड सैंपल लिया। इसके कुछ समय बाद लैब से जारी ऑफिशियल रिपोर्ट में बच्चे का ब्लड ग्रुप 'A+' बताया गया। **पीलिया की जांच के दौरान धोखाधड़ी का खुलासा**
जब बच्चे का इलाज कर रहे डॉक्टर ने 'नीरज डायग्नोस्टिक्स' की रिपोर्ट देखी, तो उसमें पीलिया का लेवल (बिलीरुबिन लेवल) बढ़ा हुआ पाया गया। डॉक्टर की सलाह पर, परिवार ने नतीजों की पुष्टि के लिए बंगाली स्क्वायर स्थित 'यूनिपैथ स्पेशलिटी लैब' में बच्चे का ब्लड दोबारा टेस्ट करवाने का फैसला किया।
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'यूनिपैथ लैब' की रिपोर्ट में बच्चे का ब्लड ग्रुप 'B+' बताया गया। दोनों लैब के नतीजों में इस अंतर को देखकर परिवार हैरान रह गया। जब परिवार ने पहली लैब ('नीरज डायग्नोस्टिक्स') से इस अंतर के बारे में सफाई मांगी, तो लैब ने अपनी गलती छिपाने के लिए पहले वाले नतीजे को टाइपिंग या प्रिंटिंग की गलती बताकर टाल दिया और तुरंत एक नई रिपोर्ट जारी की जिसमें ब्लड ग्रुप 'B+' बताया गया। **मेडिकल इलाज और नवजात शिशु की जान को खतरा**
यह मामला बहुत गंभीर है क्योंकि पैथोलॉजी रिपोर्ट नवजात शिशुओं का इलाज करने वाले डॉक्टरों के लिए मुख्य और सबसे ज़रूरी आधार होती है। अगर मेडिकल इमरजेंसी के दौरान गलत ब्लड ग्रुप रिपोर्ट के आधार पर ब्लड ट्रांसफ्यूजन किया जाता या गलत तरीके से इलाज शुरू हो जाता, तो बच्चे की जान जा सकती थी। यह घटना पूरी प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाती है—सैंपल लेने और लैब में जांच करने से लेकर क्वालिटी कंट्रोल और रिपोर्ट वेरिफ़िकेशन तक।
**CMHO से जांच और कार्रवाई की मांग**
इस घटना से नाराज़ होकर, बच्चे के पिता ने इंदौर के चीफ मेडिकल एंड हेल्थ ऑफिसर (CMHO) डॉ. माधव हसानी के पास शिकायत दर्ज कराने की कोशिश की है। परिवार का आरोप है कि इंदौर में तेज़ी से बढ़ रहे पैथोलॉजी और डायग्नोस्टिक सेंटरों की देखरेख, एक्रेडिटेशन और क्वालिटी ऑडिटिंग में भारी लापरवाही बरती जा रही है, जिससे मरीज़ों की जान खतरे में पड़ रही है।

