पहाड़ों का देसी अल्ट्रासाउंड! खीरे से बच्चे का लिंग बताने का दावा, वीडियो ने मचाई हलचल
भारत में गर्भ में पल रहे शिशु का लिंग जन्म से पहले जानना कानूनन अपराध है. प्रेग्नेंसी में लिंग निर्धारण पर सख्त पाबंदी है ताकि कन्या भ्रूण हत्या जैसी कुप्रथाओं पर रोक लगाई जा सके. इसके बावजूद कुछ इलाकों में लोग पुराने टोटकों और पारंपरिक तरीकों से लिंग जानने की कोशिश करते रहते हैं. अब पहाड़ी क्षेत्रों से एक ऐसा ही वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है जिसमें खीरे को देसी अल्ट्रासाउंड मशीन बताया जा रहा है.
वीडियो में दिखाया गया है कि लोग खीरे के ऊपरी हिस्से को काटकर गर्भस्थ बच्चे का लिंग बताने का दावा करते हैं. स्थानीय लोगों का कहना है कि यह तरीका काफी सटीक होता है. वे इसे आधुनिक अल्ट्रासाउंड का देसी विकल्प बता रहे हैं. विदेशों में पर्पल कैबेज टेस्ट, बेकिंग सोडा टेस्ट जैसी कई घरेलू विधियां पहले से वायरल हैं. अब भारतीय पहाड़ों से खीरे वाला यह तरीका चर्चा में आ गया है. यहां ये जान लेना जरूरी है कि इसका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है.
खीरा खोलेगा राज
खीरे की बनावट या काटने से गर्भ में पल रहे शिशु के लिंग का कोई संबंध नहीं होता. यह महज अंधविश्वास और पारंपरिक मान्यता है. डॉक्टर और वैज्ञानिक बार-बार चेतावनी देते हैं कि ऐसे टोटके भरोसेमंद नहीं होते. अल्ट्रासाउंड जैसी मेडिकल तकनीक ही सही जानकारी दे सकती है लेकिन भारत में लिंग बताना गैरकानूनी है. पीसीपीएनडीटी एक्ट के तहत गर्भ में लिंग की जांच करना और बताना दंडनीय अपराध है. इसका मकसद लिंग अनुपात को संतुलित रखना और कन्या भ्रूण हत्या रोकना है. कई राज्यों में अल्ट्रासाउंड सेंटर्स पर सख्त निगरानी रखी जाती है. ऐसे में खीरे जैसे टोटकों का प्रचार भी समाज में गलत संदेश फैला सकता है. पहाड़ी इलाकों में पारंपरिक ज्ञान और घरेलू नुस्खे पीढ़ियों से चले आ रहे हैं. कुछ नुस्खे स्वास्थ्य के लिए उपयोगी होते हैं लेकिन लिंग निर्धारण जैसे मामलों में ये पूरी तरह अवैज्ञानिक हैं. वीडियो में लोग आत्मविश्वास के साथ दावा कर रहे हैं कि खीरा काटकर वे सही बता देते हैं लेकिन संयोग और अटकल का खेल इसमें मुख्य भूमिका निभाता है. आधे मामलों में सही और आधे में गलत होने की संभावना स्वाभाविक

