गजब: इस गांव में पत्नी के प्रेंग्नेंट होने पर पति कर लेता है दूसरी शादी, पत्नी भी दे देती है इजाजत
भारत विविधताओं का देश है, जहां हर राज्य की संस्कृति, परंपराएं और रहन-सहन का तरीका एक-दूसरे से अलग है। लेकिन इसी विविधता के बीच कुछ ऐसी प्रथाएं और परंपराएं भी छिपी हुई हैं, जो आधुनिक समाज को सोचने पर मजबूर कर देती हैं। इनमें से एक है – पानी की किल्लत के कारण बहुविवाह की प्रथा, जो आज भी देश के कई गांवों में प्रचलित है।
यह सुनने में जितना अजीब लगता है, हकीकत में यह उतना ही दुखद और सोचनीय है। राजस्थान के बाड़मेर जिले के देरासर गांव और महाराष्ट्र के सूखा प्रभावित इलाकों में यह परंपरा दशकों से चली आ रही है, जहां एक पुरुष पहली पत्नी की सहमति से दूसरी शादी करता है – और वो भी सिर्फ इसलिए ताकि पानी की समस्या से निपटा जा सके।
देरासर गांव: जहां पत्नी गर्भवती हो, तो पति कर लेता है दूसरी शादी
राजस्थान के मरुस्थलीय इलाके बाड़मेर के देरासर गांव में पानी की भयंकर किल्लत है। यहां गर्मियों में तापमान 45 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है, और पीने का साफ पानी मिलना एक संघर्ष बन जाता है। गांव की महिलाएं सुबह से शाम तक मीलों पैदल चलकर पानी लाने जाती हैं। बचपन से ही लड़कियों को यह काम सिखा दिया जाता है, ताकि वे बड़ी होने पर इस जिम्मेदारी को संभाल सकें।
लेकिन सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि जब कोई महिला गर्भवती होती है, तो उसके लिए पानी ढोना असंभव हो जाता है। ऐसे में उसका पति, पहली पत्नी की मर्जी से दूसरी शादी कर लेता है, ताकि नई पत्नी पानी लाने का काम कर सके और साथ ही पहली पत्नी की देखभाल भी कर सके। यह परंपरा इतनी गहराई से गांव की सोच में समाई हुई है कि शादी के पहले ही दिन से लड़कियों को इस बात का अंदेशा होता है कि उनके पति भविष्य में दूसरी शादी कर सकते हैं – और वो भी उनकी सहमति से।
महाराष्ट्र की ‘वॉटर वाइव्स’: पानी के लिए दूसरी पत्नियां
राजस्थान की तरह महाराष्ट्र के मराठवाड़ा और विदर्भ जैसे इलाकों में भी पानी की समस्या ने लोगों की जिंदगी को बुरी तरह प्रभावित किया है। आंकड़ों के मुताबिक, महाराष्ट्र के करीब 19,000 गांव सूखा प्रभावित हैं, जहां पानी के लिए लोगों को 10 से 15 किलोमीटर दूर तक जाना पड़ता है।
इन इलाकों में पुरुषों ने पानी लाने की जिम्मेदारी निभाने के लिए दूसरी, तीसरी पत्नियां तक रख ली हैं, जिन्हें गांव में ‘वॉटर वाइव्स’ या ‘वॉटर बाईस’ कहा जाता है। यह शब्द सुनने में जितना अजीब लगता है, हकीकत में उतना ही दर्दनाक है – क्योंकि इन महिलाओं की पहचान केवल ‘पानी लाने वाली’ तक सीमित रह जाती है।
सामाजिक स्वीकृति और सरकारी उदासीनता
इन गांवों में यह बहुविवाह कानूनी रूप से नहीं, बल्कि सामाजिक सहमति से होता है। चौंकाने वाली बात यह है कि इन मामलों में प्रशासन और कानून भी अक्सर खामोश नजर आते हैं। क्योंकि जब दूसरी शादी महिला की मर्जी से होती है और उसका कारण सामाजिक और पारिवारिक जरूरतें बताई जाती हैं, तो अधिकारी भी कुछ कहने की स्थिति में नहीं रहते।
पर क्या ये वाकई सहमति है? या सदियों की परंपरा और संसाधनों की कमी की वजह से मजबूरी में उठाया गया कदम? यह सवाल बहुत बड़ा है।
महिलाओं की स्थिति और मानवाधिकार
इन प्रथाओं का सबसे बड़ा प्रभाव महिलाओं की गरिमा और उनके मानवाधिकारों पर पड़ता है। एक महिला को सिर्फ इसलिए दूसरी पत्नी की जरूरत मानना कि वह गर्भवती है और पानी नहीं ला सकती – यह सोच महिलाओं को केवल एक संसाधन के रूप में देखने जैसी है।
जबकि शादी एक सामाजिक और भावनात्मक संबंध होता है, लेकिन इन इलाकों में यह पानी लाने वाले सहायक की नियुक्ति जैसा प्रतीत होता है। ऐसे में जरूरी है कि सरकार और समाज मिलकर इन समस्याओं की जड़ तक पहुंचे और पानी जैसी बुनियादी सुविधाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करे, ताकि ऐसी मजबूर प्रथाएं खत्म हो सकें।
समाधान की दिशा में क्या हो?
सरकार को चाहिए कि:
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गांवों में रेनवाटर हार्वेस्टिंग, टैंकर और जल स्रोतों का निर्माण तेजी से किया जाए।
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महिलाओं को वैकल्पिक रोजगार और सशक्तिकरण के साधन मुहैया कराए जाएं।
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बहुविवाह की प्रथाओं पर कानूनी रूप से सख्ती बरती जाए, भले ही वह सहमति से हो।
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स्थानीय स्तर पर जनजागरूकता अभियान चलाए जाएं, जिससे सामाजिक सोच में बदलाव आए।
निष्कर्ष
राजस्थान और महाराष्ट्र जैसे राज्यों के कई गांवों में बहुविवाह केवल सामाजिक परंपरा नहीं, बल्कि पानी जैसी मूलभूत जरूरत की विफलता की कहानी है। ये कहानियां हमें यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि आज भी हमारे देश में कुछ हिस्सों में विकास और आधुनिकता की पहुंच कितनी सीमित है।
अगर समय रहते सरकार और समाज ने मिलकर इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए, तो ऐसी प्रथाएं न केवल महिलाओं के अधिकारों को कमजोर करेंगी, बल्कि हमारी सामाजिक संरचना को भी चोट पहुंचाएंगी।

