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आखिर कैसे बनाई जाती है स्कूल वाली पेंसिल? लकड़ी के बीच किस तरह पहुंचती है काली लीड? चकरा जाएगा माथा!

आखिर कैसे बनाई जाती है स्कूल वाली पेंसिल? लकड़ी के बीच किस तरह पहुंचती है काली लीड? चकरा जाएगा माथा!

स्कूल के दिनों में पेंसिल का इस्तेमाल लगभग हर किसी ने किया है। कॉपी पर लिखने से लेकर ड्राइंग बनाने तक पेंसिल हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा रही है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर लकड़ी की पेंसिल के अंदर वह काली लीड पहुंचती कैसे है? बाहर से देखने पर यह प्रक्रिया बेहद आसान लगती है, लेकिन फैक्ट्री में पेंसिल बनाने का तरीका काफी दिलचस्प और तकनीकी होता है।

सबसे पहले पेंसिल बनाने के लिए उपयुक्त लकड़ी का चयन किया जाता है। आमतौर पर ऐसी लकड़ी इस्तेमाल की जाती है जिसे आसानी से काटा और तराशा जा सके। लकड़ी को छोटे-छोटे आयताकार बोर्ड या पट्टियों में काटने के बाद उनकी सतह को समतल किया जाता है।

इसके बाद लकड़ी की पट्टियों में मशीन की मदद से बेहद सटीक और बराबर दूरी पर लंबी-लंबी खांचे बनाई जाती हैं। इन्हीं खांचों में बाद में पेंसिल की काली लीड रखी जाती है। यहां ध्यान रखने वाली बात यह है कि पेंसिल की लीड वास्तव में सीसे की नहीं होती। आधुनिक पेंसिल में मुख्य रूप से ग्रेफाइट और मिट्टी का मिश्रण इस्तेमाल किया जाता है।

अब आती है सबसे दिलचस्प प्रक्रिया। ग्रेफाइट और मिट्टी को निश्चित अनुपात में मिलाकर एक गाढ़ा मिश्रण तैयार किया जाता है। इस मिश्रण को मशीनों के जरिए बेहद पतली और लंबी छड़ों के रूप में निकाला जाता है। इन छड़ों को सुखाया जाता है और फिर भट्ठी में विशेष तापमान पर पकाया जाता है। इससे पेंसिल का मजबूत लेखन वाला कोर तैयार होता है।

तैयार लीड को लकड़ी की पट्टी में बनाए गए खांचों में सावधानी से रखा जाता है। इसके ऊपर दूसरी लकड़ी की पट्टी रखकर दोनों हिस्सों को मजबूत गोंद से चिपका दिया जाता है। इस तरह लीड दो लकड़ी की परतों के बीच पूरी तरह बंद हो जाती है। यानी पेंसिल की लीड को लकड़ी के अंदर अलग से ड्रिल करके नहीं डाला जाता, बल्कि दो लकड़ी की पट्टियों के बीच रखकर उसे बंद किया जाता है।

इसके बाद चिपकी हुई लकड़ी को मशीन में भेजा जाता है। मशीन एक साथ कई पेंसिलों का आकार काटती है। यही वह प्रक्रिया है, जिसमें साधारण लकड़ी का ब्लॉक धीरे-धीरे पेंसिल के आकार में बदल जाता है। पेंसिल को षटकोणीय, गोल या दूसरे आकार में भी तैयार किया जा सकता है।

आकार मिलने के बाद पेंसिल की सतह को चिकना किया जाता है और उस पर रंग या पेंट की कई परतें लगाई जाती हैं। इसके बाद कंपनी का नाम, पेंसिल की ग्रेड और अन्य जानकारी प्रिंट की जाती है। आखिर में एक तरफ पेंसिल को नुकीला किया जाता है और जरूरत के मुताबिक दूसरी तरफ इरेजर भी लगाया जा सकता है।

सबसे दिलचस्प बात यही है कि जिसे हम आम बोलचाल में पेंसिल की लीड कहते हैं, वह सीसा नहीं बल्कि ग्रेफाइट आधारित पदार्थ होता है। यही वजह है कि पेंसिल से लिखने पर कागज पर काला निशान बनता है।

तो अगली बार जब आप हाथ में स्कूल वाली पेंसिल उठाएं, तो याद रखिए कि इसके अंदर की काली लीड किसी छोटे छेद के जरिए लकड़ी में नहीं डाली जाती। लकड़ी की दो पट्टियों के बीच उसे बेहद सटीक तरीके से रखकर पूरी पेंसिल तैयार की जाती है। यही साधारण सी दिखने वाली पेंसिल बनाने की प्रक्रिया इसे खास और दिलचस्प बनाती है।

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