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दिमाग के इशारे पर चलने वाला रोबोट, बिना छुए इंसान के आदेश समझने की कोशिश

दिमाग के इशारे पर चलने वाला रोबोट, बिना छुए इंसान के आदेश समझने की कोशिश

विज्ञान और तकनीक की दुनिया में लगातार नए प्रयोग हो रहे हैं। अब वैज्ञानिक ऐसी तकनीक विकसित करने पर काम कर रहे हैं, जिसमें इंसान के दिमाग के संकेतों से रोबोट को नियंत्रित किया जा सकेगा। यानी भविष्य में रोबोट हाथ या आवाज के आदेश के बजाय सीधे दिमाग के इशारों को समझकर काम कर सकेंगे।

इस तकनीक को ब्रेन-कंप्यूटर इंटरफेस (Brain Computer Interface - BCI) कहा जाता है। इसमें इंसान के मस्तिष्क से निकलने वाले इलेक्ट्रिकल सिग्नल को पढ़कर कंप्यूटर या मशीन तक पहुंचाया जाता है।

दिमाग के सिग्नल से मिलेगी कमांड

जब इंसान किसी काम के बारे में सोचता है, तो दिमाग में विशेष तरह की गतिविधियां होती हैं। वैज्ञानिक इन्हीं संकेतों को पकड़ने और समझने की कोशिश कर रहे हैं।

BCI तकनीक की मदद से रोबोट यह समझ सकता है कि व्यक्ति क्या करना चाहता है। उदाहरण के तौर पर अगर कोई व्यक्ति रोबोट को आगे बढ़ने, किसी वस्तु को उठाने या कोई खास काम करने का संकेत देता है, तो रोबोट उस निर्देश के अनुसार प्रतिक्रिया दे सकता है।

दिव्यांग लोगों के लिए बड़ी उम्मीद

दिमाग से नियंत्रित होने वाले रोबोट और उपकरण खासतौर पर उन लोगों के लिए मददगार साबित हो सकते हैं, जो किसी कारण से अपने हाथ-पैरों का इस्तेमाल नहीं कर पाते।

ऐसे लोग भविष्य में केवल सोच के जरिए व्हीलचेयर, रोबोटिक हाथ या अन्य उपकरणों को नियंत्रित कर सकेंगे। इससे उनकी स्वतंत्रता और जीवन की गुणवत्ता में बड़ा सुधार आ सकता है।

रोबोटिक्स में नई क्रांति की तैयारी

दिमाग से चलने वाली रोबोट तकनीक का इस्तेमाल स्वास्थ्य, अंतरिक्ष, उद्योग और बचाव अभियानों जैसे क्षेत्रों में भी किया जा सकता है।

भविष्य में ऐसे रोबोट खतरनाक जगहों पर इंसानों की मदद कर सकते हैं, जहां सीधे जाना जोखिम भरा होता है। अंतरिक्ष मिशनों में भी इस तरह की तकनीक उपयोगी साबित हो सकती है।

अभी शोध के दौर में है तकनीक

हालांकि दिमाग के संकेतों से रोबोट चलाने की तकनीक अभी पूरी तरह आम इस्तेमाल के स्तर तक नहीं पहुंची है। वैज्ञानिक सटीकता बढ़ाने, सुरक्षा सुनिश्चित करने और इसे आसान बनाने पर काम कर रहे हैं।

आने वाले समय में यह तकनीक इंसान और मशीन के रिश्ते को पूरी तरह बदल सकती है। जिस भविष्य की कल्पना कभी विज्ञान कथाओं में की जाती थी, वह अब धीरे-धीरे वास्तविकता की ओर बढ़ रहा है।

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