अंग्रेजों के जमाने का कागज लेकर कनाडा से भारत आया कपल, यूपी के बलिया में खौज निकालीं 155 साल पुरानी जड़ें
विदेश में रहने के बावजूद अपनी पारिवारिक जड़ों और पूर्वजों के इतिहास को जानने की चाह लोगों को हजारों किलोमीटर दूर तक खींच लाती है। उत्तर प्रदेश के बलिया में ऐसा ही एक दिलचस्प मामला सामने आया, जहां कनाडा से भारत पहुंचे एक दंपती ने अंग्रेजों के जमाने के पुराने दस्तावेजों के सहारे अपने परिवार का करीब 155 साल पुराना इतिहास तलाशने की कोशिश की। इस खोज के जरिए उन्हें अपने पूर्वजों की उस धरती तक पहुंचने का अवसर मिला, जहां से उनके परिवार का संबंध रहा था।
दंपती अपने साथ पुराने समय का एक कागज लेकर आए थे। बताया जा रहा है कि इस दस्तावेज में उनके पूर्वजों से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी दर्ज थी। इसी जानकारी के आधार पर उन्होंने बलिया में अपने परिवार की जड़ों का पता लगाने का प्रयास किया। विदेश में कई पीढ़ियां बिताने के बाद अपने पूर्वजों की जन्मभूमि और पारिवारिक इतिहास को जानना उनके लिए भावनात्मक अनुभव रहा।
अंग्रेजों के जमाने का दस्तावेज बना अहम कड़ी
पुराने दस्तावेज इतिहास को समझने का महत्वपूर्ण माध्यम होते हैं। इनमें दर्ज नाम, पते, तारीखें और अन्य जानकारियां परिवार की पिछली पीढ़ियों के बारे में सुराग दे सकती हैं। कनाडा से आए इस दंपती के पास मौजूद कागज भी उनकी खोज में अहम कड़ी बना।दस्तावेज के आधार पर दंपती ने बलिया में अपने पूर्वजों से संबंधित स्थानों और जानकारियों का पता लगाने की कोशिश की। उनकी तलाश करीब 155 साल पुराने पारिवारिक इतिहास से जुड़ी थी। इस तरह की खोज में स्थानीय लोगों, पुराने रिकॉर्ड और ऐतिहासिक दस्तावेजों की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।
15 दिन की तलाश के बाद मिला गांव का पता
मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, कनाडा के टोरंटो निवासी 75 वर्षीय इमतेज और उनकी पत्नी वर्नी अलाय ने अपने पूर्वजों के गांव तक पहुंचने के लिए करीब 15 दिनों तक खोजबीन की। इस दौरान उन्हें खरसरा ग्राम पंचायत के पंचायत सचिव मिथिलेश कुमार पांडेय से मदद मिली। पुराने दस्तावेज में दर्ज पते और स्थानीय जानकारी के आधार पर आखिरकार वे बेलौना टोला तक पहुंच गए।
1871 में मजदूर बनकर कनाडा गए थे पूर्वज
इमतेज के मुताबिक, उनके परिवार की परदादी सोमेरिया, उनकी बहन मुराचिया और भाई कौलू इसी इलाके से कोलकाता गए थे। इसके बाद वर्ष 1871 में उन्हें गिरमिटिया मजदूर के रूप में कनाडा भेज दिया गया। उस समय उनकी परदादी की उम्र करीब 14 साल थी, जबकि उनके भाई-बहन लगभग 10 और 8 वर्ष के थे।परिवार ने उस दौर से जुड़ा इमिग्रेशन पेपर पीढ़ियों तक संभालकर रखा। दस्तावेज पर अंग्रेज अधिकारियों के हस्ताक्षर और पुराने पते की जानकारी दर्ज थी। यही कागज करीब डेढ़ सदी बाद परिवार को अपने पूर्वजों की जन्मभूमि तक ले आया।
गांव पहुंचकर भावुक हुआ दंपती
अपने पूर्वजों की धरती पर पहुंचना इमतेज और वर्नी अलाय के लिए भावुक कर देने वाला पल था। हालांकि, रिपोर्टों के अनुसार, उन्हें अपने परिवार का पुराना पैतृक घर नहीं मिल पाया और वर्तमान में गांव में उनके परिवार का कोई सदस्य भी नहीं रहता है। इसके बावजूद अपने पूर्वजों के गांव तक पहुंचना उनके लिए बड़ी उपलब्धि रही।यह कहानी बताती है कि समय और दूरी के साथ परिवार की कई पीढ़ियां भले ही अपनी जन्मभूमि से दूर चली जाएं, लेकिन अपनी जड़ों को जानने की इच्छा बनी रह सकती है। वर्ष 1871 का एक पुराना कागज कनाडा में रहने वाले इस दंपती के लिए इतिहास का ऐसा दरवाजा बना, जिसने उन्हें 155 साल बाद उत्तर प्रदेश के बलिया से जोड़ दिया।

