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गदर क्रांति से आजाद हिंद फौज तक: अंग्रेजों की नींद उड़ाने वाले क्रांतिकारी रास बिहारी बोस

नई दिल्ली, 24 मई (आईएएनएस)। भारत के स्वतंत्रता संग्राम में कई ऐसे क्रांतिकारी हुए, जिन्होंने अपनी पूरी जिंदगी देश को आजाद कराने के लिए समर्पित कर दी। उन्हीं महान सेनानियों में एक नाम रास बिहारी बोस का भी है। गदर क्रांति से लेकर आजाद हिंद फौज की नींव मजबूत करने तक, उन्होंने अंग्रेजी शासन के खिलाफ ऐसा संघर्ष छेड़ा, जिसने ब्रिटिश हुकूमत को हिलाकर रख दिया था। उन्हें आज भी अंग्रेजों की नींद उड़ाने वाला क्रांतिकारी कहा जाता है।
गदर क्रांति से आजाद हिंद फौज तक: अंग्रेजों की नींद उड़ाने वाले क्रांतिकारी रास बिहारी बोस

नई दिल्ली, 24 मई (आईएएनएस)। भारत के स्वतंत्रता संग्राम में कई ऐसे क्रांतिकारी हुए, जिन्होंने अपनी पूरी जिंदगी देश को आजाद कराने के लिए समर्पित कर दी। उन्हीं महान सेनानियों में एक नाम रास बिहारी बोस का भी है। गदर क्रांति से लेकर आजाद हिंद फौज की नींव मजबूत करने तक, उन्होंने अंग्रेजी शासन के खिलाफ ऐसा संघर्ष छेड़ा, जिसने ब्रिटिश हुकूमत को हिलाकर रख दिया था। उन्हें आज भी अंग्रेजों की नींद उड़ाने वाला क्रांतिकारी कहा जाता है।

25 मई 1886 को बंगाल के एक कायस्थ परिवार में जन्मे रास बिहारी बोस के मन में बचपन से ही देशभक्ति की भावना थी। साल 1905 के आसपास वह क्रांतिकारी गतिविधियों से जुड़ गए और धीरे-धीरे अंग्रेजों के खिलाफ बड़े आंदोलनों का हिस्सा बनने लगे। उस समय देश में अंग्रेजी शासन के खिलाफ गुस्सा बढ़ रहा था और युवा क्रांतिकारी खुलकर विरोध कर रहे थे। ऐसे में भला रास बिहारी कैसे पीछे रहने वाले थे।

रास बिहारी बोस का नाम सबसे ज्यादा उस घटना के लिए याद किया जाता है, जब उन्होंने तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड हार्डिंग पर हमला करने की योजना बनाई। 23 दिसंबर 1912 को लॉर्ड हार्डिंग की दिल्ली में भव्य सवारी निकाली जा रही थी। योजना के तहत युवा क्रांतिकारी बसंत कुमार विश्वास को बम फेंकने की जिम्मेदारी दी गई। जैसे ही हार्डिंग की सवारी चांदनी चौक पहुंची, बम फेंका गया और जोरदार धमाका हुआ। इस हमले में हार्डिंग घायल हो गया, जबकि उसका हाथी मारा गया। हालांकि, वह बच गया और रास बिहारी की योजना पूरी तरह सफल नहीं हो सकी, लेकिन इस घटना के बाद से अंग्रेजों की नींद जरूर उड़ गई थी।

बौखलाए अंग्रेजों ने इस घटना के बाद से भारतीय क्रांतिकारियों के खिलाफ बड़ा अभियान शुरू कर दिया। गिरफ्तारी से बचने के लिए रास बिहारी बोस देहरादून लौट आए और सामान्य जीवन जीने लगे। उस समय वह फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट में क्लर्क की नौकरी करते थे, लेकिन अंग्रेज लगातार उनकी तलाश में लगे रहे। बढ़ते खतरे को देखते हुए वह जापान चले गए।

जापान पहुंचने के बाद भी उन्होंने भारत की आजादी की लड़ाई को नहीं छोड़ा। वहां रहकर उन्होंने भारतीय क्रांतिकारियों को संगठित किया और ‘इंडियन इंडिपेंडेंस लीग’ को मजबूत बनाया। उनका मकसद विदेशों में रह रहे भारतीयों को स्वतंत्रता आंदोलन से जोड़ना और आर्थिक व राजनीतिक समर्थन जुटाना था।

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान रास बिहारी बोस ने भारतीय सैनिकों को एकजुट कर अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई की तैयारी शुरू की। इसी सोच से आजाद हिंद फौज यानी इंडियन नेशनल आर्मी की बुनियाद रखी गई। हालांकि, बाद में इस फौज को नई पहचान और ताकत नेताजी सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व में मिली, लेकिन इसकी नींव तैयार करने में रास बिहारी बोस की सबसे बड़ी भूमिका थी।

साल 1943 में जब नेताजी सुभाष चंद्र बोस जापान पहुंचे, तब रास बिहारी बोस ने उनका जोरदार स्वागत किया। उस समय वह इंडियन इंडिपेंडेंस लीग के अध्यक्ष थे। उन्होंने लीग और आजाद हिंद फौज की कमान नेताजी को सौंप दी। इसके बाद वह सलाहकार की भूमिका में रहे और स्वतंत्रता आंदोलन को मजबूत करने में योगदान देते रहे।

रास बिहारी बोस के संघर्ष और योगदान को देखते हुए जापान सरकार ने उन्हें अपने दूसरे सबसे बड़े सम्मान ‘ऑर्डर ऑफ द राइजिंग सन’ से सम्मानित किया था। आमतौर पर यह सम्मान किसी विदेशी नागरिक को बहुत कम दिया जाता था।

21 जनवरी 1945 को रास बिहारी बोस का निधन हो गया, लेकिन देश की आजादी के लिए उनका योगदान हमेशा याद किया जाता है।

--आईएएनएस

एमटी/डीकेपी

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