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NCP बैठक में दिखी अंदरूनी खींचतान! सुनील तटकरे के बयान पर भड़के छगन भुजबल

 

महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर अंदरूनी मतभेद खुलकर सामने आते दिखाई दिए हैं। Sunil Tatkare के एक बयान ने पार्टी के भीतर हलचल बढ़ा दी है। उन्होंने कहा कि मुश्किल समय में न तो कोई विधायक खुलकर उनके समर्थन में सामने आया और न ही पार्टी नेतृत्व ने उनका साथ दिया। तटकरे के इस बयान के बाद बैठक का माहौल अचानक गरमा गया।

बताया जा रहा है कि पार्टी की अहम बैठक के दौरान सुनील तटकरे ने अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि जब वे राजनीतिक संकट से गुजर रहे थे, तब उन्हें अपेक्षित समर्थन नहीं मिला। उन्होंने इशारों-इशारों में पार्टी के नेताओं और विधायकों की चुप्पी पर सवाल उठाए। तटकरे की इस टिप्पणी को पार्टी के भीतर बढ़ती असंतुष्टि के तौर पर देखा जा रहा है।

हालांकि तटकरे के बयान पर वरिष्ठ नेता Chhagan Bhujbal ने तुरंत आपत्ति जताई। भुजबल ने कहा कि इस तरह के मुद्दों को सार्वजनिक रूप से या पार्टी बैठक में उठाना उचित नहीं है। उन्होंने सुझाव दिया कि संगठनात्मक विषयों और व्यक्तिगत नाराजगी को अलग तरीके से सुलझाया जाना चाहिए।

छगन भुजबल ने कहा कि पार्टी की बैठकों का उद्देश्य संगठन को मजबूत करना और आगामी राजनीतिक रणनीति पर चर्चा करना होता है। ऐसे में व्यक्तिगत शिकायतों को बैठक का हिस्सा बनाना सही संदेश नहीं देता। उनके इस बयान के बाद बैठक में मौजूद नेताओं के बीच कुछ देर तक चर्चा का माहौल बना रहा।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह घटना पार्टी के भीतर चल रही अंदरूनी खींचतान का संकेत हो सकती है। महाराष्ट्र की राजनीति में हाल के वर्षों में लगातार बदलते समीकरणों और गठबंधन की राजनीति के बीच कई नेताओं की नाराजगी समय-समय पर सामने आती रही है।

तटकरे की टिप्पणी को लेकर राजनीतिक गलियारों में कई तरह की चर्चाएं शुरू हो गई हैं। कुछ लोग इसे पार्टी नेतृत्व पर अप्रत्यक्ष दबाव बनाने की कोशिश मान रहे हैं, जबकि कुछ इसे व्यक्तिगत पीड़ा का सार्वजनिक इजहार बता रहे हैं।

वहीं पार्टी के अन्य नेताओं ने मामले को ज्यादा तूल न देने की बात कही है। उनका कहना है कि बड़े राजनीतिक दलों में विचारों का मतभेद होना सामान्य बात है और सभी मुद्दों का समाधान बातचीत के जरिए निकाला जाएगा।

इस घटनाक्रम के बाद विपक्षी दलों ने भी पार्टी की एकजुटता पर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि ऐसे मतभेद लगातार सार्वजनिक होते रहे तो इसका असर पार्टी की छवि और संगठनात्मक मजबूती पर पड़ सकता है।

फिलहाल इस बयानबाजी के बाद महाराष्ट्र की राजनीतिक हलचल और तेज हो गई है। अब सभी की नजर इस बात पर है कि पार्टी नेतृत्व इस विवाद को किस तरह संभालता है और आने वाले दिनों में इसका क्या राजनीतिक असर देखने को मिलता है।