ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक में ईरान-यूएई के बीच उभरे मतभेद, भारत ने की संवाद की वकालत
नई दिल्ली, 24 मई (आईएएनएस)। अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते संघर्ष तथा उसके खाड़ी क्षेत्र पर पड़ रहे प्रभावों के बीच नई दिल्ली में रविवार को ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक आयोजित की गई। इस दौरान समूह के भीतर अलग-अलग मत सामने आए, खासकर ईरान और यूएई के बीच।
अंतरराष्ट्रीय संबंधों और पश्चिम एशिया मामलों पर नियमित रूप से लेख लिखने वाले पूर्व भारतीय राजनयिक अनिल त्रिगुणायत ने ‘सेवियर्स’ में लिखे अपने लेख में कहा कि सहमति की कमी यह दर्शाती है कि यदि पश्चिम एशिया में जारी तनाव जल्द नहीं थमा, तो ब्रिक्स को आगे और बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।
उन्होंने कहा कि तनाव कम करने के लिए “संवाद, कूटनीति और तनाव में कमी” भारत की प्राथमिक रणनीति बनी हुई है।
अनुभवी राजनयिक ने लिखा, “प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने क्षेत्र और दुनिया के विभिन्न नेताओं के साथ व्यापक बातचीत की, ताकि तनाव कम किया जा सके और पश्चिम एशिया में रह रहे भारत के लगभग एक करोड़ प्रवासियों के हितों की रक्षा सुनिश्चित की जा सके।”
त्रिगुणायत ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी ने भारत की अध्यक्षता के दौरान ब्रिक्स के लिए ‘बिल्डिंग फॉर रेजिलिएंस, इनोवेशन, कोऑपरेशन एंड सस्टेनेबिलिटी’ थीम के जरिए इस मंच को नया विस्तार देने का प्रयास किया गया। यह थीम उस दिशा का प्रतीक है, जिस ओर तेजी से बंटती वैश्विक व्यवस्था में एक गैर-पश्चिमी मंच के रूप में ब्रिक्स आगे बढ़ सकता है।
हालांकि ब्रिक्स मुख्य रूप से भू-आर्थिक सहयोग पर केंद्रित है, लेकिन भू-राजनीतिक विभाजन और महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा उसके गैर-टकराव वाले स्वरूप को प्रभावित करती है। भारत लगातार यह स्पष्ट करता रहा है कि गैर-पश्चिमी का अर्थ पश्चिम-विरोधी नहीं है।”
पूर्व राजनयिक ने कहा, “लेकिन जब अमेरिका और कई बड़ी शक्तियां अंतरराष्ट्रीय कानून और द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनी व्यवस्थाओं से दूर होती जा रही हैं, तब वैश्विक सहभागिता के वैकल्पिक ढांचे और मॉडल की तलाश तेज हो गई है।”
त्रिगुणायत के अनुसार, सितंबर में भारत ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की अध्यक्षता करेगा, लेकिन अमेरिका-ईरान-इजरायल संघर्ष के कारण सर्वसम्मति आधारित संयुक्त दस्तावेज तैयार होने की संभावना पर अनिश्चितता छा गई है।
हालांकि उन्होंने जोर देकर कहा कि ब्रिक्स केवल मौजूदा संघर्ष तक सीमित नहीं है। यह समूह “आर्थिक सहयोग, आतंकवाद-रोधी प्रयासों, जलवायु कार्रवाई, व्यापार, प्रौद्योगिकी, कनेक्टिविटी, लोगों के बीच संपर्क और सतत विकास” जैसे व्यापक एजेंडे पर काम कर रहा है।
उन्होंने कहा कि भारत की अध्यक्षता में सुरक्षा, समृद्धि और ग्लोबल साउथ के देशों के समान विकास को बढ़ावा देने के लिए कई व्यावहारिक और भविष्य-दृष्टि वाली पहलें सामने आ सकती हैं।
त्रिगुणायत ने कहा, “समानता, न्याय और संतुलन, जो सहमति, समावेशिता और सतत विकास से प्रेरित हैं, अब ब्रिक्स के मूल सिद्धांतों और भारत की व्यापक कूटनीतिक प्राथमिकताओं की पहचान बनते जा रहे हैं। आंतरिक और बाहरी चुनौतियों के बावजूद ये सिद्धांत ग्लोबल साउथ या ‘ग्लोबल मेजॉरिटी’ देशों के बीच तेजी से प्रासंगिक और आकर्षक बन रहे हैं।”
ब्रिक्स के प्रति भारत की प्रतिबद्धता दोहराते हुए विदेश मंत्री जयशंकर ने कहा था, “भारत आपसी समझ, एकजुटता, खुलेपन, समावेशिता, पूर्ण परामर्श और सहमति के सिद्धांतों के अनुरूप ब्रिक्स को मजबूत करने के लिए प्रतिबद्ध है।”
--आईएएनएस
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